जन्म कुंडली ज्योतिष शास्त्र का एक महत्वपूर्ण तत्व है, जो किसी मानव के जीवन, भविष्य और व्यक्तित्व को समझने में बहुत मदद करता है। जन्म कुंडली में विभिन्न ग्रहों की स्थिति, युति, दृष्टि, नक्षत्रों और राशियों की स्थिति के आधार पर कईं महत्वपूर्ण Kundli ke Yog बनते हैं। ये योग व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे कि सुख, दुःख, सफलता, असफलता, स्वास्थ्य, धन, और संबंधों पर गहरे शुभ और अशुभ प्रभाव डालते हैं। कुंडली में बनने वाले योगों को समझकर और विश्लेषण करके मानव जीवन की चुनौतियों और अवसरों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
कुंडली में बनने वाले विशिष्ट योगों का अध्ययन करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान दिया जाता है। निम्नांकित बिन्दुओं के आधार पर तय किया जा सकता है कि कुंडली में कौन-कौन से योग बन रहे हैं।
- जातक का जन्म किस लग्न में हुआ है और लग्नेश कौन-से भाव में बैठा है?
- 9 ग्रह कौन कौन से भावों में विराजमान हैं?
- कितने ग्रह स्व-क्षेत्र, मित्र क्षेत्र, शत्रु क्षेत्र में मौजूद हैं?
- उच्च और नीच ग्रहों की संपूर्ण जानकारी।
- कौन-सा ग्रह कहां दृष्टि डाल रहा है?
- ग्रहों के बल की जानकारी जैसे कि उच्च वली, मध्यम बली या हीन बली है।
सावधानी पूर्वक इन सभी बातों पर विचार करने के बाद ही कुंडली में योग व फल विचार करना चाहिए। इस लेख में हम 20 विशेष योगों के बारे में चर्चा करेंगे, जिनमें 10 शुभ योग और 10 अशुभ योग शामिल हैं। ये भी जानेंगे कि जन्म कुंडली में पाए जाने वाले ये योग किस प्रकार जातक के जीवन को प्रभावित करते हैं।
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10 शुभ Kundli ke Yog
ज्योतिषाचार्यों ने सैंकड़ो ऐसे योगों के बारे में विचार किया है, जो जातक के जीवन पर बहुत ही शुभ प्रभाव डालते हैं। लाखों लोगों की कुंडलियों के अध्ययन से इन योगों को परखा और जांचा गया है। वैसे तो हजारों पुस्तकें मौजूद हैं जिनमें कुंडली में बनने वाले योगों की जानकारी उपलब्ध है। लेकिन केवल इस विषय पर केंद्रित पुस्तकें बहुत कम देखने को मिलती हैं।
कुंडली में बनने वाले योगों पर डा. बी वी रमन की पुस्तक ‘तीनसौ महत्वपूर्ण योग’ मुझे पसंद है। इसके अलावा डा. नारायण दत्त श्रीमाली कृत ‘भारतीय ज्योतिष’ भी इस विषय पर अच्छे से बताया गया है। मैंने अध्ययन उपरांत सैंकड़ों योगों में से 10 महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध शुभ योगों को आपके सामने रखने का प्रयास किया है।
1. गजकेसरी योग
यह ज्योतिषीयों द्वारा अधिकत्म विचार किया जानेवाला शुभ योग है। जन्म कुंडली के अंदर तीन परिस्थितियों में गजकेसरी योग बनता है।
- गुरु जब चंद्रमा से केंद्र में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव में उपस्थित होता है।
- पराशर ज्योतिष के अनुसार जब शुक्र या बुद्ध चंद्रमा के साथ यूति करते हैं या एक दूसरे पर दृष्टि डालते हैं तो गज केसरी योग बनता है।
- कुछ ज्योतिषी लगन से भी जब गुरु केंद्र में होता है तो इसे गजकेसरी योग मानते हैं।
ज्योतिष शास्त्र में ऐसा माना जाता है कि जिस व्यक्ति की कुंडली में गजकेसरी योग बनता है, वह महान कार्य करता है, और कुशल वक्ता होता है। यह योग व्यक्ति को बुद्धिमान, धनी, और प्रतिष्ठित भी बनाता है। इस योग के जातक की कुंडली में चंद्रमा जितना बली होगा, वह जीवन में उतना ही उच्च पद प्राप्त करता है, और समाज में बड़ा मान-सम्मान प्राप्त करता है।
2. राजयोग
इस योग पर ज्योतिषविद् बहुत ज्यादा ध्यान देते हैं। माना जाता है कि जब राजयोग कुंडली में बनता है तो व्यक्ति को सफलता, धन और प्रसिद्धि प्राप्त होती है। यह योग कुंडली के 12 भावों में ग्रहों की भिन्न-भिन्न स्थितियों के आधार पर बनता है। ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि कुंडली में राजयोग वाले जातक जीवन में उच्च स्तर की सफलता प्राप्त करते हैं, और राजा के जैसा जीवन जीते हैं। कुंडली में करीब 20 से अधिक प्रकार के राज योग देखने को मिलते हैं। आइए जानते हैं कि कुंडली में यह योग ग्रहों की किन-किन स्थितियों के आधार पर बनते हैं:
- मकर लग्न के Birth Chart में शनि लग्नाधिपति हो, मिथन राशि में मंगल, बुध हो कन्या राशि में, बृहस्पति हो धनु में तो एसी कुंडली का मालिक सफललतापूर्वक नेतृत्व करने वाला होता है।
- जिस व्यक्ति की कुण्डली में उच्च के चार ग्रह मूल त्रिकोण भावों में बैठे हों तो वह जातक मंत्री या राज्यपाल के पद तक पहुंचने का दमखम रखता है।
- केन्द्र में शुक्र, बुध और बृहस्पति बैठे हों और भौम ग्रह लग्न भाव से दसवें घर में विराजमान हो तो, पूर्ण सम्भावना बनती है कि वह राज्य में किसी उच्च पद को प्राप्त करता है, और राजा के जैसा जीवन जीता है।
- जिसका लग्न मेष का हो और लग्न भाव में चन्द्रमा और मंगल एक साथ हो, तो ऐसा व्यक्ति हजारों लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। राज्य सरकार में अहम भूमिका निभाता है।
- उच्च का सूर्य लग्न में हो और लग्न मेष का हो तथा नवम भाव में बृहस्पति और दशम भाव में मंगल ग्रह विद्यमान हो तो जातक राज्यपाल के पद तक पहुंचने का सामर्थ्य रखता है।
- मेष लग्न मे अगर मंगल और बृहस्पति दोनों साथ में विराजमान हैं, तो ऐसा व्यक्ति विदेशों में भ्रमण करने वाले केन्द्रीय मंत्री पद पर आसीन होते है।
- मेष लग्न में जातक जन्म ले और प्रथम भाव पर किसी भी पाप-ग्रह की दृष्टि नहीं पड़ रही हो, तो ऐसा व्यक्ति प्रशासनाधिकारी बनता है।
- अगर मेष लग्न में कोई पापग्रह हो और नौंवे भाव में गुरु स्थित हो तो जातक केन्द्र में मन्त्री का पद का अधिकारी होता है।
- मेष लग्न की जन्म कुण्डली में ग्यारहवें भाव में शशि तथा बृहस्पति विद्यमान हों और शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो, तो वह व्यक्ति राज्य में किसी सम्मानित उच्च पद को प्राप्त करता है।
- अगर चन्द्रमा स्थित मेष लग्न हो और शनि कुम्भ राशि में और सूर्य सिंह राशि में और गुरु वृश्चिक राशि में हो तो जातक को उच्च पद की प्राप्ति होती है।
- कर्क राशि का लग्न हो, षष्ठम भाव में में सूर्य, शुक्र चतुर्थ स्थान में, दशम में बृहस्पति और सप्तम भाव में बुध बैठा हो, तो जातक उच्च पद को प्राप्त करता है।
- अगर कर्क लग्न की कुंडली हो और लग्न भाव में चंद्रमा, दसवें भाव में मंगल तथा बृहस्पति मौजूद हो तो ऐसा जातक नेतागिरी करता है।
- चन्द्रमा स्थित मीन लग्न, शनि दशम स्थान में और बुध चतुर्थ भाव में हो तो जातक नेतृत्व के गुण से भरपूर नेता बनकर पार्लियामेंट तक पहुंचता है।
- सूर्य लग्न में उच्च के चन्द्रमा साथ हो तो जातक सरकार के विदेश विभाग में सचिव स्तर के पद पर कार्यरत होता है।
- उच्च का मंगल व शुक्र मूल त्रिकोण भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति खाद्यय विभाग का मंत्री पद प्राप्त करता है।
- मंगल मेष राशि में, शुक्र तुला राशि में, और बृहस्पति कर्क राशि का हो तो व्यक्ति शासकीय कार्यों में बड़े लेवल का आफिसर बनता है।
- सूर्य धनु राशि में, उच्च का शनि लग्न भाव में हो तो जातक सरकार के खूफिया विभाग में रहकर राज्य के लिए कार्य करता है, और राजा जैसा जीवन जीता है।
- कुंडली में सभी ग्रह उच्च के हों और उन पर मित्र ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो जातक बड़े स्तर का शासकीय प पदाधिकारी होता है।
- केन्द्र भाव में स्थित लग्नाधिपति पर मित्र ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो, तो जातक की कुंडली में राजयोग बनता है। वह राजा के जैसा जीवन बिताता है।
- कुण्डली में पूर्णोच्च के चन्द्रमा पर सभी ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो व्यक्ति सबसे बड़े पद वाला राज्याधिकारी बनता है।
- अगर उच्च के चन्द्रमा को शुक्र ग्रह पूर्ण दृष्टि से देख रहा हो, तो ऐसा व्यक्ति लोगों का मत और विश्वास प्राप्त कर नेता बनकर उभरता है। (भारतीय ज्योतिष पृष्ठ संख्या 127-128)
3. लक्ष्मी योग
तीन परिस्थितियों में यह योग बनता है-
- अगर लग्न का स्वामी बली हो और नवे भाव का अधिपति भाग्येश उच्च का हो या अपनी ही राशि में केंद्र या त्रिकोण भाव में बैठा हो तो लक्ष्मी योग बनता है।
- लग्नेश और भाग्येश परस्पर युति करें तो यह योग बनता है।
- भाग्येश और शुक्र अपनी ही राशि में हो या उच्च राशि में केन्द्र या त्रिकोण में विद्यमान हैं तो लक्ष्मी योग बनता है।
इस योग वाला व्यक्ति धार्मिक, धनवान और पराक्रमी होता है। तीसरे नंबर की परिस्थिति में बनने वाला लक्ष्मी योग अत्यधिक प्रभावी माना जाता है।
4. सूर्य योग
जब सूर्य से दुसरे घर में बुध और बुध से ग्यारहवें भाव में चन्द्र और चंद्रमा से पांचवें या नौंवे स्थान में गुरु विराजमान है, तो कुंडली में भास्कर योग बनता है। यह योग जातक की नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास को बल प्रदान करता है। इस Kundli ke Yog से जातक को अनेक शुभ फल प्राप्त होते हैं जैसे कि शास्त्रों का ज्ञाता, धनी, पराक्रमी, ज्योतिष का ज्ञानी, संगीत के प्रति रुचि रखने वाला बनाता है।
5. महाभाग्य योग
- किसी पुरुष का जन्म दिन में हो और सूर्य, चंद्रमा और लगन की राशियां विषम संख्या में हो तो उस पुरुष की राशि में महाभाग्य योग बनता है।
- किसी स्त्री का जन्म रात्रि के समय में हो और उस समय सूर्य, चंद्रमा और लग्न सम राशियों में हो तो महाभाग्य योग बनता है।
इस योग के प्रभाव से व्यक्ति ऊंचे चरित्र वाला, उदार प्रकृति वाला प्रसिद्ध शासक बनता है, या शासक के समान उन्नति करने वाला, दिर्घायु, सदाचरण करने वाला होता है।
6. बुधादित्य योग
बुधादित्य योग तब बनता है जब किसी भाव में बुध और सूर्य एक साथ होते हैं अर्थात बुध और सूर्य की युति से यह योग बनता है। यहां एक बात जरूर ध्यान रखनी चाहिए कि सूर्य और बुध के बीच की दूरी 10 अंश से कम नही होनी चाहिए। बुध ही एक मात्र ऐसा ग्रह है जो सूर्य के साथ रहकर भी अस्त नही होता है, जबकि सूर्य के प्रभाव क्षेत्र में आने के साथ ही बाकी सभी ग्रह अस्त हो जाते हैं।
बुधादित्य योग जातक को बुद्धिमान, तर्कशील और सफल व्यक्ति बनाता है। इस योग वाले लोग जीवन में उच्च शिक्षा और बहुत प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।
7. चतुसागर योग
जब केंद्र के सभी भावों में ग्रह स्थित हों अर्थात 1,4,7,10 स्थानों में कोई न कोई ग्रह जरूर मौजूद हैं, तो चतु:सागर योग बनता है। यह योग बहुत ही शुभ माना जाता है। इस योग वाला जातक दीर्घायु और धनी होता है, उसकी शासक के तुल्य प्रसिद्धि होती है।
8. कलानिधि योग
गुरु अगर दूसरे और पांचवें भाव में बुध और शुक्र के साथ युति करें या इन पर गुरु की दृष्टि हो या बृहस्पति दूसरे और पांचवें भाव में बुध और शुक्र के क्षेत्र में हो तो कला निधि योग बनता है।
इस योग का जातक उत्तम व्यवहार वाला, राजाओं के द्वारा सम्मान पाने वाला, अनेक प्रकार की सवारियों घोड़े, गाड़ियों का मालिक, कुलीन परिवार का बालक होता है, जो रोगों से भी मुक्त रहता है।
9. हंस योग
जब गुरु अपनी ही राशि में हो या उच्च राशि में हो और साथ में केंद्र में स्थित हो तो हंस योग बनता है। इस योग के विषय में ज्योतिषी को सोच विचार करके ही फल बताना चाहिए क्योंकि यह योग व्यक्ति के चरित्र के बारे में जानकारी देता है।
माना जाता है, कि हंस योग वाले व्यक्ति के पैरों में कुछ आकृतियां नजर आती है, जैसे की मछली, कमल, शंख इत्यादि। ऐसे लोगों का शरीर बहुत सुंदर होता है, यह सब के प्रिय होते हैं, न्यायवादी और स्पष्ट दिमाग वाले होते हैं। आचार्य वराहमिहिर पंच महापुरुष योगों के रूप में हंस योग का वर्णन अपनी पुस्तक वृहद संहिता में किया है।
10. हरिहर ब्रह्मा योग
धन भाव के स्वामी से अष्टम भाव और द्वादश भाव में शुभ ग्रह हों या गुरु, चंद्र और बुध सप्तम भाव के अधिपति से चतुर्थ, अष्टम और नवम् भाव में हो, या सूर्य, शुक्र व मंगल लग्न के स्वामी से चतुर्थ, दशम और एकादश भाव में हो तो हरिहर ब्रह्म योग बनता है
इस योग वाला जातक विश्वास करने योग्य ज्ञानी वेदों का ज्ञाता, दुश्मनों का विनास करने वाला, जरूरतमंदों की मदद करने वाला, धार्मिक और पवित्र कार्यों में रुचि रखने वाला होता है
10 अशुभ Kundli ke Yog
यह कुंडली में बनने वाले कुछ ऐसे योग होते हैं जो बड़े ही अशुभ फल देते हैं। इनके कारण जातक को अपने जीवन में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इनमें से कुछ योग तो इतने प्रभावशाली होते हैं कि व्यक्ति के जीवन को नरक बनाकर रख देते हैं, जैसे की कालसर्प योग, केमद्रुम योग इत्यादि। अगर कुंडली में इस प्रकार के योग बनते हैं तो जातक को ज्योतिषीय उपायों के माध्यम से इनके प्रभाव को कम करने का प्रयास करना चाहिए।
1. कालसर्प योग (Kaalsarp Dosh)

किसी भी कुंडली में कालसर्प योग तब बनता है जब सभी सात ग्रह राहु और केतु के बीच में स्थित होते हैं। कुल मिलाकर 12 प्रकार के कालसर्प योग माने गए हैं। प्रत्येक कालसर्प योग राहु केतु के भिन्न-भिन्न भावों में होने पर बनते हैं। इस योग को विस्तार से समझने के लिए हमारा लेख- (KAALSARP DOSH: जानें कालसर्प दोष के लक्षण, भेद, प्रभाव, उपाय) पढ़ें। यह योग व्यक्ति के जीवन में बाधाएं, संघर्ष और दुःख लाता है। इस योग वाले लोगों को जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
उपाय-
- चांदी के नाग नागिन का जोड़ा, नाग पंचमी के दिन पूजा पाठ के उपरांत बहते पानी में छोड़ने से कालसर्प दोष का प्रभाव कम हो जाता है।
- भगवान शिव के मंदिर महाकालेश्वर में कालसर्प दोष निवारण पूजा करने से यह दोष समाप्त हो जाता है।
2. केमद्रुम योग (Kemdrum Dosh)
- जब कुंडली में चंद्रमा से द्वादश और दूसरे भाव में कोई भी ग्रह स्थित ना हो और चंद्रमा अकेला हो तो केमद्रुम योग बनता है
- चंद्रमा के दोनों तरफ के भाव में कोई भी ग्रह नही हो तो भी केमद्रुम योग बनता है।
यह दोष जातक को मानसिक रूप से परेशान रखता है और उसको हमेशा अज्ञात खतरे का डर लगा रहता है। डॉ बी वी रमन तो अपनी पुस्तक ‘300 important combinations’ में केमद्रुम योग के विषय में यहां तक लिखते हैं कि-
इस Kundli ke Yog से ग्रस्त जातक दुखी, गंदा, अनुचित काम करने वाला, दूसरों पर निर्भर रहने वाला, दुष्ट प्रवृत्ति वाला, ठगी करने वाला बनता है।
ज्योतिषविद् इस योग के कुछ प्रकार बताते हैं जैसे कि-
- लग्न भाव और सप्तम भाव में चंद्रमा हो और उसे गुरु नहीं देख रहा हो।
- शुक्र और शनि दोनों नीच राशि में हों, शत्रु राशि और पाप राशि में हों, एक दूसरे को देखते हों अथवा दोनों ग्रह एक ही राशि में हों।
- चंद्रमा नीच राशि में हो, या पाप ग्रह से युक्त हो तो यह योग बनता है।
- जातक का जन्म रात्रि में हुआ हो और चंद्रमा सीन हो कर नीच राशि में किसी ग्रह से युति कर रहा हो।
- व्यक्ति का जन्म रात्रि में हुआ हो और चंद्रमा की स्थिति कमजोर हो और उस पर दसवें भाव के अधिपति की दृष्टि हो तो यह योग बनता है।
इस योग में पैदा हुआ जातक राजा के घर में पैदा होने के बावजूद भी दरिद्रता पूर्वक जीवन जीता है।
कुंडली में केमद्रुम योग के भंग होने की परिस्थितियां:
- अगर केंद्र में चंद्रमा हो और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो माना जाता है कि यह योग भंग हो जाता है।
- केंद्र में शुक्र का होना भी इस योग को भंग कर देता है।
- अगर चंद्रमा शुभ ग्रहों के साथ युति कर रहा है, और उस पर गुरु की दृष्टि है, तो भी यह योग भंग हो जाता है।
- अगर 10 में भाव के चंद्रमा पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो भी यह योग भंग हो जाता है।
- लग्न में चंद्रमा पूर्ण हो और शुभ ग्रहों के साथ युति कर रहा हो तो भी योग भंग हो जाता है।
जब जब केंद्रम योग का विश्लेषण किया जा रहा हो तो ऊपर लिखित भंग होने की स्थितियों का अध्ययन जरूर करना चाहिए ऐसी परिस्थितियों में इस योग को निष्क्रिय मानकर चलना चाहिए।
उपाय: चंद्रावर के दिन किए जाने वाले धार्मिक कृत्यों से इस योग के प्रभाव को कम किया जा सकता है, जैसे कि- सोमवार का व्रत, भगवान शिव की उपासना, चांदी की धातु में मोती को धारण करना, चांदी का कड़ा या कोई अन्य आभूषण पहनना। एकादशी के व्रत से भी इस दोष में लाभ मिलता है।
3. मांगलिक दोष

जन्म कुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम,अष्टम और द्वादश भाव में मंगल ग्रह बैठा हो तो जातक को मांगलिक माना जाता है। इनमें से अगर मंगल ग्रह लग्न भाव में, चतुर्थ भाव में, और द्वादश भाव कम प्रभावी और अष्टम और सप्तम भाव में अधिक घातक माना जाता है। अगर चतुर्थ भाव में मंगल मेष लग्न का हो, सातवें भाव में मंगल मकर राशि का हो तो और भी ज्यादा घातक समझना चाहिए।
लेकिन अनेक बार देखा गया है कि कुंडली में मांगलिक दोष तो होता है, परन्तु कुंडली में मौजूद कुछ ग्रह स्थितियों और दृष्टियों के कारण मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है इस विषय में संपूर्ण जानकारी और उपायों के लिए आप हमारा यह लेख पड़े- (MANGLIK DOSH NIVARAN: लक्षण, परिहार | MANGAL DOSHA REMEDIES)
4. पितृ दोष
ऐसा माना जाता है कि चंद्रमा के दक्षिणी छोर पर रहने वाली हमारे पितरों की आत्माएं अतृप्त होती है तो वह अपने वंशजों को कष्ट देने लगती है। इसे ही पितृ दोष कहा जाता है।
कुंडली में पितृदोष- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में पितृ दोष के बनने की कई परिस्थितियों कही गई हैं, जो कि इस प्रकार हैं:
- कुंडली के अष्टम भाव में बृहस्पति और राहु एक साथ विराजमान है तो पितृ दोष बनता है।
- अगर कुंडली में पंचम व प्रथम भाव में शनि मंगल और सूर्य ग्रह बैठे हैं तो पितृ दोष माना जाता है।
- राहु ग्रह कुंडली के त्रिकोण व केंद्र भाव में बैठा हो तो भी पितृदोष बनता है।
- जब कुंडली में राहु के साथ सूर्य चंद्र और लगे इसका सीधा संबंध बने तो भी पितृदोष माना जाता है।
इस योग के प्रभाव के कारण परिवार में क्लेश आने लगता है स्त्रियों को गर्भ नहीं ठहरता परिवार में किसी की अकाल मृत्यु होती है। विवाह आदि धार्मिक कार्यों में बाधाएं उत्पन्न होने लगती है।
उपाय- पितृदोष निवारण के लिए ज्योतिष शास्त्र में कुछ उपाय जाए गए हैं जिनके करने से इस दोष का प्रभाव कम हो जाता है। अच्छे से अगर प्रयास किया जाए तो पितृ दोष समाप्त भी हो जाता है।
- घर में पितृ शांति के लिए ब्रहामणों द्वारा पाठ करवाया जाए तो पितृ दोष समाप्त हो जाता है।
- चतुर्दशी पूर्णिमा और अमावस्या के दिन पीपल की पूजा करने से पितृ दोष से मुक्ति मिल जाती है।
- सच्चे भाव से अमावस्या के दिन पूजा पाठ हवन करने और पितरों को जल अर्पित करने से और ब्राह्मणों को भोजन कराने से और वस्त्र दान करने से पितृ दोष समाप्त हो जाता है।
5. गर्भपात योग
स्त्रियों की कुंडली में इस योग का होना बहुत ही अशुभ फल देता है। यह योग निम्नलिखित परिस्थितियों में जातक की कुंडली में बनता है:
- अगर कुंडली में पांचवें भाव या पंचमेश और बृहस्पति पर शनि और राहु की पूर्ण दृष्टि पड़ रही हो।
- एकादश भाव में मंगल शनि और सूर्य की युति हो रही हो।
- पांचवें भाव का स्वामी आठवें भाव में हो और पांचवें भाव पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि पड़ रही हो।
- पांचवें भाव में सूर्य, मंगल, राहु, पंचमेश के साथ स्थित हों।
यह योग मुख्य रूप से स्त्री जातक के लिए अशुभ माना जाता है। इसका सबसे अधिक प्रभाव स्त्री के गर्भ पर पड़ता है और अगर यह योग प्रबल हो तो स्त्री का गर्भपात होने की संभावना बढ़ जाती है।
उपाय- हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। प्रतिदिन सुबह-सुबह भगवान सूर्य को जल अर्पित करें। सूर्य के बल को बढ़ाने से इस योग के प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है।
6. दरिद्रता योग
जातक की कुंडली में यह योग निम्नलिखित प्रकार की पांच स्थिति में बनता है:
- किसी भाव में राहु और चंद्रमा एक साथ हो और पाप ग्रहों की उन पर पूर्ण दृष्टि पड़ रही हो।
- लग्न या चंद्रमा से केंद्र भाव बिल्कुल खाली हो या उनमें पाप ग्रह स्थित हों।
- लगन से केंद्र या त्रिकोण भाव में नीच राशि या शत्रु क्षेत्री चंद्रमा हो और चंद्रमा से छठे आठवें और 12वें भाव में बृहस्पति स्थित हो तो यह योग बनता है।
- द्वादशेश की दूसरे भाव के स्वामी या दसवें भाव के स्वामी या आठवें भाव के स्वामी या लग्नाधिपति के साथ किसी भी भाव में युति हो।
- छठे भाव के स्वामी की नवम भाव के स्वामी तीसरे भाव के स्वामी लाभेश पंचम भाव के स्वामी द्वादश भाव के स्वामी या सप्तमेश के साथ यूति हो तो भी यह योग बनता है।
माना जाता है कि इस योग वाला जातक बेशक कितने भी धनवान परिवार में जन्म ले, परंतु उसका जीवन किसी न किसी कारण से गरीबी में बीतता है। दरिद्रता उसका साथ नहीं छोड़ती।
उपाय- पुण्य करने से ही इस दोष का निवारण हो सकता है जैसे की जरूरतमंदों को अन्न धन का दान करना। काले कुत्ते को रोटी डालना। काली गाय को चारा डालना। गरीबों के लिए भोजन का इंतजाम करना। सोमवार के उपवास करना। भगवान शिव की पूजा अर्चना करना इत्यादि।
7. अस्वाभाविक मृत्यु योग
अगर लग्नेश की दृष्टि चंद्रमा पर पड़ रही हो, छठे आठवें और 12वें भाव में शनि मांदि या राहु से युक्त हो दुर्मरण योग बनता है।
यह अक्सर देखा गया है कि कुंडली में चंद्रमा और लग्नेश जब भी किसी प्रकार के बुरे प्रभाव आते हैं तो निश्चित रूप से बहुत ही अशुभ फल देते हैं। दुर्मरण योग से पीड़ित व्यक्ति की अचानक में मौत हो जाती है। मृत्यु के अनेक कारण हो सकते हैं जैसे की आत्महत्या कर लेना। गलती से विष पी लेना। अचानक से किसी अस्त्र-शस्त्र से मृत्यु हो जाना। किसी जंगली जानवर या जंतु द्वारा मारा जाना। डूब कर मर जाना। किसी वाहन से दुर्घटना होना इत्यादि।
कुंडली में बनने वाले दुर्मरण योग के कुछ रूप:
- अगर भाग्य भाव में मंगल हो और शनि राहु और सूर्य से युति कर रहा हो तो अस्त्र से मृत्यु होने की संभावना रहती है।
- चतुर्थ भाव में अस्त ग्रह या नीच का ग्रह स्थित हो और रिपु भाव में जलिय राशि हो तो पानी में डूब कर मृत्यु होने की संभावना बनती है।
- सातवें भाव में शनि, सूर्य, राहु की युति हो तो विषधारी जानवरों द्वारा आकस्मिक मृत्यु का योग बनता है।
- मंगल ग्रह अगर मकर या कुंभ राशि में हो और गुरु के भाव में बुध हो, तो बाघ जैसे खूंखार जानवर के द्वारा मृत्यु का योग बनता है।
उपाय- शनि और चंद्रमा को मजबूत करने से इस Kundli ke Yog से बचा जा सकता है। शनि चालीसा का पाठ करने से लाभ मिलता है। चंद्रमा को मजबूत करने के लिए भगवान शिव की उपासना करने से लाभ मिलता है।
8. अंगारक योग
अगर कुंडली में राहु या केतु के साथ मंगल ग्रह युति या दृष्टि संबंध बनाता है, तो ये अंगारक योग बनता है। मुख्यतः पाप ग्रह राहु की मंगल के साथ युति सबसे ज्यादा प्रभावी मानी जाती है। यह योग अपने प्रभाव से जातक के स्वभाव को आक्रामक बनाता है। इसके कारण व्यक्ति को अपने जीवन में अनेक कार्यों में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। ज्योतिष शास्त्र में इस योग को बहुत अशुभ कहा गया है।
उपाय- हनुमान चालीसा का पाठ करने से इस योग का प्रभाव कम हो जाता है। लाल रंग की गाय की सेवा करना अच्छा रहेगा। पंछियों को दाना डालने से भी लाभ मिलता है।
9. विष योग
अगर Birth chart में किसी घर में शनि और चंद्रमा की युति हो रही हो अथवा चंद्रमा पर शनि की पूर्ण दृष्टि पड़ रही हो तो विष योग बनता है। चंद्र के साथ शनि की युति सबसे प्रभावशाली विष योग को बनाती है। इस योग का सीधा नकारात्मक असर जातक की मानसिक स्थिति पर पड़ता है, क्योंकि चन्द्रमा को मन का कारक ग्रह माना जाता है। अशांत मन से व्यक्ति के confidence पर बहुत ग़लत प्रभाव देखने को मिलता है।
उपाय- इस योग से पीड़ित व्यक्ति को अपने निर्णय लेने में सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अपने इष्ट की पूजा करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। शनिवार के दिन डकोत को तेल का दान करें और शनि चालीसा का भी पाठ करें। महामृत्युंजय पाठ से भगवान शंकर जी की पूजा-अर्चना से लाभ मिलेगा।
10. चांडाल योग
कुंडली में गुरु और राहु की युति गुरु चांडाल योग को बनाती हैं। कुछ ज्योतिषविदों ने तो इस योग को कालसर्प योग से भी ज्यादा अशुभ माना है। इस योग का नकारात्मक प्रभाव जातक की धन संपत्ति से संबंधित, चरित्र से संबंधित, शिक्षा दीक्षा से संबंधित विषयों पर ज्यादा देखा जाता है।
चांडाल योग भंग- कुछ परिस्थितियों में यह योग कुंडली में सप्ताह ही समाप्त हो जाता है या प्रभावहीन हो जाता है इस Kundli ke Yog पर विचार करने से पहले कुंडली की अच्छे से पड़ताल करके देख लेना चाहिए कि कहीं यह योग भंग तो नहीं हो रहा है इसके भंग होने के लक्षण इस प्रकार हैं:
- कुंडली में अगर बृहस्पति अपनी उच्च राशि में है तो यह योग भंग हो जाता है।
- गुरु और राहु के साथ अगर कोई भी अन्य ग्रह मौजूद है तो भी यह योग प्रभावहीन मारा जाता है।
- गुरु का अस्त होना या बकरी होना भी इस योग के प्रभाव को समाप्त कर देता है।
उपाय- अगर कुंडली में यह योग सिद्ध हो जाता है तो जातक को गुरुवार के व्रत करने चाहिए। जरूरतमंदों को पीले वस्त्र या पीली उपयोग योग्य किसी भी सामग्री का दान करना चाहिए। भगवान विष्णु की उपासना से लाभ मिलता है। पूजा के समय माथे पर केसर मिलाकर सफेद चंदन का तिलक लगाना चाहिए।
निष्कर्ष
कुंडली विश्लेषण में योगों का गहरा अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि माना जाता है कि कुंडली में बनने वाले योग मनुष्य के जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। शुभ योगों के प्रभाव से जातक को जीवन में सफलता, धन-संपत्ति और सुख-शांति प्राप्त होती है, इसके विपरित अशुभ Kundli ke Yog व्यक्ति के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। जीवन में अनेक प्रकार की बाधाएं और समस्याएं उत्पन्न करते हैं।
कुंडली विश्लेषण के समय योगों का पता लगाकर, उनको अच्छे से समझकर, हम अपने जीवन आने वाली चुनौतियों का सामना बेहतर ढंग कर सकते हैं। समस्याओं को समझ सकते हैं, और डट कर सकारात्मक तरीकों से उनका सामना कर सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र में अशुभ दोषों के प्रभाव को कम करने या समाप्त करने के लिए अनेक प्रकार के उपाय सुझाए गए हैं। कुंडली में ग्रहों की शुभ स्थिति और उपायों के माध्यम से अशुभ योगों के प्रभाव को कम करने का प्रयास किया जाता है।
अगर आपको लगता है कि आपकी कुंडली में किसी प्रकार का कोई विशेष योग बन रहा है, तो आपको सुझाव दिया जाता है कि किसी अनुभवी ज्योतिषी का परामर्श जरूर लें। ज्योतिष शास्त्र के उपयोग से हम अपने जीवन को संवार सकते हैं, एक बेहतर जीवन बना सकते हैं और भविष्य की अच्छी प्लानिंग करते हुए सही दिशा में जीवन मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।
स्रोत: भारतीय ज्योतिष, 300 important combinations, गीता पपञ्चाङ्ग, Jyotish Piyush etc Hindi Writing google input Tool
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