‘Lagadha vedanga jyotisha’ आचार्य लगध द्वारा रचित यह प्रथम ज्योतिष शास्त्र है, जो ऋग्वेद और यजुर्वेद में समाहित ज्योतिषीय ज्ञान और विज्ञान को आधार बनाकर लिखा गया है। वेदांग ज्योतिष को खगोलशास्त्र की शोध और अध्ययन प्रक्रियाओं को प्रकट करने वाला पहला स्वतंत्र ज्योतिष ग्रंथ कहा गया है।
लगधाचार्य कृत वेदांग ज्योतिष सामान्य जीवन की कई जरूरी गतिविधियों जैसे कि समय का निर्धारण, धार्मिक अनुष्ठानों का काल निर्धारण, शुभ मुहूर्त का समय, और सामाजिक आयोजनों के लिए उचित समय निर्धारण इत्यादि कार्यों में सबसे प्रमुख भूमिका निभाता है। वेदांग ज्योतिष को समझने के लिए वेदांगों के विषय में ज्ञान होना बहुत जरूरी है, तो चलिए सबसे पहले वेदांग के विषय में विचार करते हैं।
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वेदांग क्या है? (What is Vedanga? )
चारों वेदों की व्याख्या हेतु ब्रह्मा जी और ऋषि मुनियों ने वेदों को वेद पुरुष मानकर 6 वेदांगो की रचना की, जो वेदों के अध्ययन को सुगम बनाते हैं। इन अंगों को ही वेदांग कहा जाता है। वेदों को समझने के लिए इन 6 अंगों का ज्ञान होना बहुत जरूरी माना गया है।
शास्त्रों में वेदों के छह अंगों को इस प्रकार बताया गया है कि- छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते, ज्योतिषामयनं चक्षु र्निरुक्तं श्रोत्र मुच्यते। शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्यकरणं स्मृतम्, तस्मात्सांग मधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते।। पाणिनीय शिक्षा (41-42 श्लोक) अर्थात: छंद वेदों के पैर है, कल्प हाथ हैं और ज्योतिष चक्षु नेत्र है। निररुक्त कान हैं, शिक्षा को नासिक और व्याकरण को मुख कहा गया है।
मुण्डकोपनिषद शास्त्र में इन सभी 6 अंगों को अपरा विद्या कहा गया है। तत्रापरा ऋग्वेदोयजुर्वेद: सामवेदो अथर्ववेद:, शिक्षाकल्पो व्याकरणं निरुक्तंछन्दो ज्योतिषमिति। मुण्डकोपनिषद (1-1-5)
वेदों के यह छह अंग क्रम से इस प्रकार हैं- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, और ज्योतिष। इन 6 वेदांगों के तीन उद्देश्य शास्त्रों में बताए गए हैं।
- वेदों के अर्थ और भाव को जानने और समझने के लिए व्याकरण और निरुक्त का ज्ञान होना बहुत जरुरी है।
- वेदों में निहित शब्दों और श्लोकों के सही उच्चारण के लिए शिक्षा और छंद का ज्ञान होना आवश्यक है।
- वेदों के यज्ञादि कर्म में उपयोग के लिए कल्प और ज्योतिष का ज्ञान होना जरूरी माना गया है।
ज्योतिष वेदांग
वेदों में ज्योतिष शास्त्र बीज रूप में विद्यमान था, वेदों में समाहित ज्योतिष को समझने और धर्म कर्म में उपयोग करने के लिए ऋषियों-मुनियों ने वेद पुरुष के छठे अंग चक्षु के रूप में ज्योतिष को स्थापित किया है। ज्योतिष अंग से तात्पर्य वेद पुरुष के छठे अंग चक्षु (नेत्र) यानि कि ज्योतिष शास्त्र से है। चलिए अब असली विषय Lagadha vedanga jyotisha पर विचार करते हैं।
लगधाचार्य कृत वेदांग ज्योतिष (Lagadha Vedanga Jyotisha)
आचार्य लगध द्वारा रचित वेदांग ज्योतिष ग्रंथ को वेदांगज्योतिषम् या ज्योतिषवेदांगम् के नाम से भी जाना जाता है। यह ग्रंथ दो भागों में विभाजित है, एक भाग को याजुष पाठ और दूसरे भाग को ऋक पाठ कहा गया है। याजुष पाठ में 44 पद्य कहे गए हैं, जबकि ऋक् पाठ में 36 पद्य आते हैं, हांलांकि दोनों पाठों की विषय वस्तु लगभग एक समान दिखाई देती है, बस कुछ स्थानों पर पद्य रचना में भिन्नता नजर आती है।
आचार्य लगध ने इस ग्रंथ में वैदिक कर्मों, सामाजिक आयोजनों के काल, संवत्सर और आयन चलन इत्यादि की गणना और निर्धारण के लिए गणितीय सूत्र का प्रतिपादन किया है। इसके अलावा आचार्य इस ग्रंथ में खगोलीय घटनाओं और पंचांग, इत्यादि के अध्यन का विवरण भी देते हैं। वर्तमान समय में भी Lagadha vedang jyotish में दिए गए सूत्रों का उपयोग शोध कार्य में किया जा रहा है।
Lagadha Vedang Jyotish का रचना काल और इतिहास
शंकर बालकृष्ण दिक्षित जी अपनी पुस्तक ‘भारतीय ज्योतिष शास्त्राचा प्राचीन आणि आर्वाचीन इतिहास’ में आचार्य लगत की रचना वेदांग ज्योतिष के रचनाकाल के विषय में बताते हैं कि करीब 1400 ईसा पूर्व में इस ग्रंथ की रचना हुई होगी। इस ग्रंथ के रचना काले विषय में अन्य इतिहासकारों के बीच कुछ मत इस प्रकार हैं।
मैक्समूलर ईसा पूर्व 3 वीं शताब्दी, कोल ब्रुक के अनुसार 1410 ईसा पूर्व, बेवर के अनुसार 5 वीं शताब्दी, प्रोफेसर व्हिटनी के अनुसार 1338 ईसा पूर्व, डा. गोपाल पाठक के अनुसार 15 वीं शताब्दी ईसा पूर्व। शंकर बालकृष्ण दिक्षित द्वारा दिया गया रचना काल काफी हदतक मान्य प्रतीक होता है।
वेदांग ज्योतिष के उपदेशक आचार्य लगध
वेदांग ज्योतिष के रचयिता और उपदेशक आचार्य लगध हैं, इसका प्रमाण इस ग्रंथ के ऋक् पाठ के श्लोक संख्या 2 के अंत में और याजुष पाठ के 44 वें श्लोक अंतिम भाग में उन्हीं के द्वारा दिया गया है।
प्रणम्य शिरसा कालंभिवाद्यं सरस्वतीम्। कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः।। (वेदांगज्योतिष ऋक पाठ श्लोक 2) इत्येतन्मासवर्षाणां मुहूर्तोदयपर्वणाम्। दिनर्श्वयनमासानां व्याख्यानं लगधोऽब्रवीत्।। (वेदांगज्योतिष याजुष पाठ श्लोक 44) इसके अलावा संपूर्ण ज्योतिष इतिहास में और पुरातात्विक रूप में लगधाचार्य के बारे में कोई अन्य प्रमाण या साक्ष्य नही मिलता है।
लगधाचार्य का जन्म स्थान और काल
जन्म स्थान: ऋक पाठ के सातवें और बाईसवें श्लोक में आचार्य लगध अपने जन्म स्थान के विषय में संकेत देते हैं, हालांकि वहां पर स्पष्ट रूप से जन्म स्थान के बारे में जानकारी उपलब्ध ना होकर संकेत मात्र है।
‘भारतीय ज्योतिष शास्त्राचा प्राचीन आणि अर्वाचीन इतिहास’ के रचनाकार शंकर बालकृष्ण दीक्षित जी वेदांग ज्योतिष ग्रंथ के अध्ययन के आधार पर बताते हैं कि 34 अंश अक्षांश स्थान अथवा 35 अंश अक्षांश स्थान के आसपास वेदांग ज्योतिष का रचना स्थान इस ग्रंथ से प्राप्त होता है।
इसी ग्रंथ में अयन संधि से विश्व संधि के अंतराल में दिनमान की दैनिक वृद्धि के बारे में भी बताया गया है, जो की दिनमान प्रतिदिन एक समान वृद्धि से बढ़ता है। इस प्रकार ये अक्षांश कश्मीर एवं तक्षशिला नमक स्थान के बारे में संकेत करते हैं।
शंकर बाल कृष्ण दिक्षित जी इसी आधार पर अनुमान लगाते हैं कि जहां वेदांग ज्योतिष की रचना हुई है संभवतः यही लगधाचार्य का जन्म स्थान भी रहा होगा। मैंने भी जब 34 अंश और 35 अंश उत्तर भारत में पड़ने वाले स्थानों का अध्ययन मानचित्र से किया तो 33.7 अंश के आसपास तक्षशिला (पाकिस्तान) और 35 अंश के आसपास कश्मीर श्रीनगर के आसपास का स्थान प्राप्त होता है।
जन्म काल: लगधमुनि के जन्म काल के विषय में भी यही अंदाजा लगाया जाता है कि जिस काल में वेदांगज्योतिष ग्रंथ की रचना हुई होगी उसी सदी को उनका जन्म काल माना जा सकता है। अर्थात 1400 ईसा पूर्व की सदी में ही उनका जन्म हुआ होगा।
वास्तव में अनुमान के अलावा कोई भी प्रत्यक्ष प्रमाण और साक्ष्य इतिहासिक साहित्य और पुरातात्विक रूप में प्राप्त नही होते हैं, जो लगधाचार्य के जन्म, स्थान, रचना काल को सिद्ध कर सकें। मात्र उनके द्वारा रचित ग्रंथ ‘वेदांग ज्योतिष’ ही वह साधन है, जिससे उनके विषय में थोड़ी बहुत जानकारी प्राप्त होती है।
लगधाचार्य का ज्योतिष शास्त्र में योगदान
Acharya Lagadha का ज्योतिष शास्त्र में योगदान अद्वितीय है। ज्योतिष के प्रारंभिक सिद्धांतों का पहली बार संकलन उन्हीं के द्वारा किया गया था। लघधाचार्य के ग्रंथ वेदांगज्योतिष में सूर्य, चंद्रमा, और ग्रहों की गति, नक्षत्रों की स्थिति, वर्ष-मास की गणना, और यज्ञादि कर्म के लिए शुभ मुहूर्त काल का निर्धारण करने के सिद्धांत आदि शामिल हैं।
लघधाचार्य यह भी स्पष्ट करते हैं कि वेदांग ज्योतिष का प्रमुख उद्देश्य खगोलीय घटनाओं को सामाजिक और धार्मिक कार्यों के साथ जोड़ना है। आचार्य लगध का यह मानना था कि सभी खगोल की घटनाएं मानव जीवन के सभी क्षेत्रों पर अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। खगोलीय घटनाओं के अध्ययन से जीवन को सरल और व्यवस्थित बनाने में सहायता मिलती है।
वेदांगज्योतिष के सिद्धांत और विधियाँ

ज्योतिष शास्त्र को समझने और समझाने के लिए इस ग्रंथ में वर्णित खगोलीय घटनाओं की गणना विधियां और ज्योतिषीय सिद्धांत बहुत महत्व रखते हैं। वर्तमान में उपलब्ध वेदांग ज्योतिष ग्रंथ में वर्णित दोनों पाठों के आधार पर निम्नलिखित सिद्धांतों और विधियों का अध्ययन किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में रूचि रखने वाले प्रत्येक विद्यार्थी और ज्योतिषी को इनका अध्ययन जरूर करना चाहिए।
- पंचसंवत्सरात्मक युग सिद्धांत: वेदांग ज्योतिष ग्रंथ में पांच सम्वतरात्मक युग सिद्धांत पद्धति मानी गई है अर्थात यह कह सकते हैं कि लगधाचार्य ने शास्त्र में पंचसंवत्सर का एक युग कहा है। ग्रंथ के आरंभ में ही वो पंचसंवत्सर युगाध्यक्षम् लिखते हैं, हांलांकि ग्रंथ में इन पांच संवत्सरों के नाम नही कहें गए हैं। इन संवत्सरों के नाम क्रमश इस प्रकार है- संवत्सर, परिवत्सर, इदावत्सर, अनुवत्सर, इद्वत्सर (तैत्तिरीय संहिता और वाजसनेयी संहिता के अनुसार)
- अयन सिद्धांत: आचार्य ने अयन आरंभ स्थान के रूप में धनिष्ठा नक्षत्र को माना है। इसके संबंध में वह लिखते हैं- पर्पधेते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक। सापार्धे दक्षिणाऽर्कस्य माघश्रावणयो: सदा।। (वेदांगज्योतिष श्लोक 7) अर्थात- धनिष्ठा नक्षत्र की शुरुआत में सूर्य और चंद्रमा उत्तर दिशा की ओर संचालित होते हैं। अश्लेषा नक्षत्र के आधे भाग पर पहुंच कर दक्षिण की ओर संचालित होने लगते हैं। सूर्य हमेशा माघ में उत्तर की ओर व श्रावण में दक्षिण की ओर गमन करता है। वेदांगज्योतिष में वर्णित अयन पद्धति में प्रयुक्त मात्रक सारणी नीचे दी गई है।

- पर्वगणानयन पद्धति: खगोलीय अध्ययन वेदांगज्योतिष का आधार है। यह माना जाता है कि ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति और गति पृथ्वी और पृथ्वीवासियों के जीवन पर प्रभाव डालती है। व्यवसाय, शिक्षा, विवाह और स्वास्थ्य से संबंधित काल निर्धारण में इस पद्धति का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। पंचांग पद्धति के अंतर्गत आचार्य लगध पर्वगण आनयन की विधि बताते हैं। यह विधि आर्यभट्ट की अहर्गणायन विधि से मेल खाती है। पर्वगणानयन विधि- निरेक द्वादशाभ्यस्तं द्विगुणं गतसंयुतम्। षष्ट्या षष्ट्या युतं द्वाभ्यां पर्वणां राशिरुच्यते।। (वेदांगज्योतिष श्लोक 13) अर्थात- बीते हुए सौर वर्ष में 1 घंटा दें और जो शेष बचे उसे 12 से गुणा करें और जो गुणनफल मिले उसे 2 से गुणा करके बीते हुए पर्व में जोड़ें। अब दो से गुणा संयुक्त मान को 60 से भाग देकर निरग्र शेष को एक बार फिर संयुक्त मान में जोड़ें और जो फल प्राप्त हो वह पर्व (अमावस्यांत या पुर्णिमांत) है।
- नक्षत्र आयन विधि: पर्वगण के उपरांत आचार्य लगध चान्द्रनक्षत्रअयन के बारे में बताते हैं कि “इदानींपर्वणि चन्द्रनक्षत्रानयनार्थं भांशानयन माह” नक्षत्रानयन विधि- भांशाः स्युरिष्टिकाः कार्याः पक्षाद्वादशकोद्गताः। एकादश गुणाश्चेन्दोः शुक्लेऽधंचैन्दवा यदि।। (वेदांगज्योतिष श्लोक 15) अर्थात- वर्तमान के 12 मासों में इष्ट चंद्र पक्ष को प्राप्त करें और इन पक्षों को 11 से गुना करें तो चंद्र का नक्षत्रांश (भांश) प्राप्त होगा। यदि चंद्र पक्ष शुक्ल पक्ष में प्राप्त हो तो पूर्वागत भांश में 128 नक्षत्राअंश का आधा 64 जोड़े तब चंद्रमा का भांश प्राप्त होगा। इसी के अंतर्गत आचार्य लगध तिथि आनयन, मानायन, युगादि पक्ष तिथि आदि के विषय में भी विस्तार से आनयन विधियों का वर्णन करते हैं।
- मुहूर्त निर्धारण: वेदांगज्योतिष में आचार्य द्वारा मुहूर्त काल का निर्धारण करने की एक विशेष प्रक्रिया के विषय में भी बताया गया है। प्राचीन काल से ही मान्यता है कि किसी कार्य को शुभ काल में करने से उसके सफल होने की संभावना बढ़ जाती है। ज्योतिष शास्त्र में मुहूर्तों का निर्धारण पंचांग (ग्रहों, नक्षत्रों, योग, और करण) के आधार पर किया जाता है, जोकि सम्पूर्ण भारतीय हिन्दू समाज में प्रत्येक धार्मिक सांस्कृतिक और सामाजिक कार्य में अनिवार्य माना जाता है।
- पंचांग गणना विधि: खगोलीय गणना के आधार पर पंचांग निर्माण वेदांगज्योतिष का एक महत्वपूर्ण कार्य है। पंचांग निर्धारण के लिए सौर वर्ष, चंद्र मास, दिन, तिथि, नक्षत्र, योग, और करण इत्यादि प्रमुख ज्योतिषीय तत्वों की गणना की जाती है। पंचांग एक माध्यम है जो पहले से ही ज्योतिषीय और खगोलीय गणना के आधार पर तैयार किया जाता है। पंचांग में आने वाले वर्षभर की सभी सामाजिक और धार्मिक जीवन से संबंधित खगोलीय और ज्योतिषीय घटनाओं की जानकारी संग्रहीत होती है।
वेदांगज्योतिष ग्रंथ में वर्णित सिद्धांतों का उपयोग आज के आधुनिक युग में भी खगोल विज्ञान और पंचांग गणना में ज्योतिषविदों द्वारा किया जा रहा है। प्राचीन वैदिक ज्ञान आज के आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बहुत करीब है। वेदांगज्योतिष के माध्यम से आज के जमानें में भी खगोलशास्त्र के नए सिद्धांतों को समझने और परखने में मदद मिलती रहती है।
भविष्य में वेदांग ज्योतिष का महत्व
वेदांगज्योतिष को केवल इतिहास का ज्ञान नहीं माना जा सकता है। भूतकाल और वर्तमान में यह ज्योतिषीयों और खगोलविदों के लिए शोध का विषय बना हुआ है और समाज का मार्गदर्शन कर रहा है, वैसे ही भविष्य में भी समाज के लिए ज्योतिषीय सिद्धांत के अनुरूप काम करता रहेगा।
वर्तमान में Jyotish Vedang को एक शैक्षणिक विषय के रूप में विश्वभर में मान्यता दी जा रही है। इसे आज अनेक भारतीय विश्वविद्यालयों में प्रमुख विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है। आधुनिक युग में खगोलशास्त्र, पंचांग गणना, और ज्योतिषीय परामर्श में Lagadha Vedanga Jyotisha उपयोग जारी है, और आने वाले समय में भी विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में वेदांग ज्योतिष का अध्ययन ओर बढ़ेगा।
भारतीय संस्कृति और धर्म में ज्योतिष शास्त्र की गहरी जड़ें होने के कारण आने वाली नई पीढ़ी के लिए भी सदा मार्गदर्शन का स्रोत बना रहेगा। आधुनिक शोध और अनुसंधान के माध्यम से इसके सिद्धांतों का परीक्षण और सत्यापन जारी रहेगा, ओर एक नए दृष्टिकोण के साथ आधुनिक समाज में प्रासंगिकता बनी रहेगी।
निष्कर्ष
Lagadha Vedanga Jyotisha और Jyotish Vedang सनातन भारतीय परम्परा और संस्कृति का एक अनमोल अंग है। इस शास्त्र का महत्व केवल खगोलीय घटनाओं के अध्ययन तक सीमित नही है, बल्कि यह हमारी संस्कृति और धार्मिक कर्मकाण्ड विधियों और सामाजिक जीवन के प्रत्येक पहलू में गहराई तक समाया हुआ है। लगधमुनि जैसे महान आचार्यों के अतुलनीय योगदान का ही परिणाम है, कि वैदिक ज्योतिष शास्त्र भारतीय समाज का अभिन्न अंग बना हुआ है।
वेदांगज्योतिष का अध्ययन और अनुसरण समाज को एक दिशा और संयमित जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करता है। इस शास्त्र के अध्ययन से हमारे अतीत का ज्ञान मिलता है, और साथ में यह भविष्य के लिए समाज को मार्गदर्शन भी प्रदान करता है। यह शास्त्र खगोलीय गणना के साथ साथ सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्वपूर्ण है।
लघधाचार्य ही वो पहले आचार्य हुए जिन्होंने वेदों में समाहित ज्योतिषीय ज्ञान को संकलित करके एक स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने ने खगोलीय घटनाओं की गणना और शोधन प्रक्रिया से अनेक ज्योतिषीय तत्वों जैसे कि पंचांग, तिथियां, ग्रह, नक्षत्र आनयन की विधियों की खोज की,जो आज भी प्रयोग की जा रही हैं। एस्ट्रोलॉजी एक ऐसा ज्ञान है, जो मानव जीवन के सभी पहलुओं के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है, चाहे वो धार्मिक कर्मकाण्ड हो, कृषि से संबंधित कार्य हों, या फिर व्यक्तिगत परामर्श हो।
वेदांगज्योतिष का अध्ययन और अनुसरण आज भी हमारे समाज के लिए प्रासंगिक है, और इसके सिद्धांत और खगोलीय घटनाओं की गणना की विधियां आधुनिक विज्ञान के साथ भी सामंजस्य स्थापित कर रही हैं। इस प्रकार, Vedanga Jyotisha भारतीय संस्कृति और सभ्यता की एक अनमोल धरोहर है, जो आने वाली हमारी पीढ़ियों के लिए भी हमेशा एक मार्गदर्शक के रूप में काम करती रहेंगी।
FAQ
वेदांग के रचयिता कौन थे?
विनैतदखिलं श्रौतं स्मार्तं कर्म न सिद्धयति। तस्माज्जगद्धितायेदं ब्रह्मणा रचितं पुरा॥ (नारदसंहिता 1 / 7) स्वयं ब्रह्मा जी के चारों मुखों से चारों वेद- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और वेदों के अध्ययन और उपयोग के सरलीकरण हेतु 6 वेदांगों- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष प्रकट हुए और मंत्रदृष्टा ऋषियों- नारद मुनि, पराशर ऋषि, गर्ग ऋषि, कश्यप ऋषि, सूर्य इत्यादि ने इन वेदों और वेदांगों का संग्रह किया।
वेदांग ज्योतिष के उपदेशक कौन थे?
लगधाचार्य को वेदांग ज्योतिष के प्रथम उपदेशक के रूप में जाना जाता है। इनके द्वारा ही वेदों में समाहित ज्योतिष वेदांग को पहली बार एक स्वतंत्र ग्रंथ ‘वेदांगज्योतिष’ के रूप में प्रस्तुत किया गया।
ज्योतिष वेद का कौन सा अंग है?
ज्योतिष शास्त्र वेदंगों में छठे नंबर का वेदांग है जिसे वेदों के चक्षु (नेत्र) कहकर संबोधित किया गया है। ‘ज्योतिषामयनं चक्षु’ (पाणिनीय शिक्षा 41)
6 वेदांग क्या है?
छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते । ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते॥ शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्। तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय शिक्षा 41-42) वेदों के अध्ययन और उपयोग की सहायता के उद्देश्य हेतु रचे गए 6 शास्त्र- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष वेदांग कहें जाते हैं।
What are the six Vedangas?
The six scriptures composed for the purpose of assisting the study and use of Vedas – Shiksha, Kalpa, Vyakarana, Nirukta, Chhanda and Jyotisha are called 6 Vedangas.
Who wrote Vedang Jyotish?
Lagdhacharya is known as the author of Vedang Jyotish. It was by him that the astrology contained in the Vedas was presented for the first time in the form of an independent text ‘Vedanga jyotisha’.
Who is the father of Jyotish?
Vedas and Vedangas were spoken from the four mouths of Lord Brahma himself and were compiled by the mantra-seeing sages. That is why Brahma Ji is called the father of Jyotish.









