जन्म कुंडली या जन्मपत्रिका भारतीय ‘फलित ज्योतिष शास्त्र’ का मूल आधार है। हम लोग जब भी अपनी या किसी जातक की कुंडली का अध्ययन और kundli analysis करने बैठते हैं तो सबसे पहले हमारा ध्यान कुंडली में मौजूद 12 घरों पर पड़ता है और मन में सवाल उठता है कि ‘How to read kundli houses in Hindi?’
आइए इस आर्टिकल में हम बड़ी ही आसान भाषा में सीखेंगे कि kundli chart में घरों या भावों (kundli houses) को किस प्रकार पढ़ा जाए, कौन-सा घर क्या संकेत देता है या बताता है? किस भाव का क्या अर्थ है? और प्रत्येक भाव में मौजूद विभिन्न ग्रहों का प्रभाव किस तरह समझा जाए जो सटीक भविष्य का अनुमान लगाया जा सके।
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कुंडली में घरों का क्या महत्व है? | Importance of Houses in Kundli Chart
इंडियन एस्ट्रोलॉजी में खगोल शास्त्र के अनुसार कुंडली को एक वृत्त या वर्ग में विभाजित किया गया है। 360 डिग्री के वृत्त को 12 भागों में विभाजित किया गया है प्रत्येक भाग 30 अंश का होता है जिन्हें हम राशियों के नाम से जानते हैं, कुंडली में इन्हें जब भाव के रूप में प्रदर्शित करते हैं इन्हें ही भाव, घर या हाउस कहते हैं।
प्रत्येक घर हमारे जीवन के किसी न किसी विशेष क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। फलित ज्योतिष में भावों को कैसे पढ़ते हैं? इसका सही उत्तर जानने के लिए हमारे लिए सबसे पहले घरों का मूल अर्थ जानना बहुत ज़रूरी होता है।
कुंडली में मौजूद घर को कैसे पहचानें? | How to See Houses in Kundli?

जब हम किसी भी कुंडली चार्ट को देखते हैं, तो सबसे ऊपर लिखा हुआ नंबर लग्न है, जिसे Ascendant कहते को दर्शाता है। यह कुंडली चार्ट का पहला घर होता है। उसके बाद anti clock wise दिशा में आगे बढ़ते हुए क्रम से सभी 12 घर या भाव गिने जाते हैं। इन्हीं सभी घरों में अलग-अलग राशियां और ग्रह स्थित होते हैं, जिनके अनुसार भाव के फल का पता लगाया जाता है।
उदाहरण स्वरुप यहाँ दिया kundli chart देखिए जोकि मेरे एक क्लाइंट का है-
आप इस कुंडली में देख सकते हैं कि पहले केन्द्र भाव में 2 संख्या लिखी है जिसका मतलब है कि इस भाव में दुसरी राशि यानी कि वृषभ है और इस राशि में बु लिखा है जिसका मतलब है बुध ग्रह अर्थात यह कुंडली वृष लग्न की है और और बुध ग्रह यहां बैठा है। वृष लग्न का स्वामी शुक्र है तो शुक्र ग्रह लग्नेश है।
जन्म कुंडली में घरों को कैसे पढ़ें? | How to Read Kundli Houses in Astrology?
किसी भी कुंडली को रीड करने के लिए नीचे दिए गए स्टेप्स को फॉलो करना होता है। इन 7 Kundli analysing steps के अनुसार अगर कुंडली का अध्ययन किया जाए तो कोई भी ज्योतिषी या सामान्य व्यक्ति भी कुंडली की सटीक जानकारी प्राप्त कर सकता है। आइए इन सभी steps को संक्षिप्त में समझते हैं।
Follow these 7 steps to read a Janam kundali
- जन्म लग्न से भाव की गिनती शुरू करें- पहला लग्न भाव होता है, फिर उससे आगे anticlockwise भाव के अनुसार बढ़ें।
- प्रत्येक घर का स्वामी देखें- हर भाव का अपना एक ग्रह स्वामी होता है जोकि उस भाव में मौजूद राशि का भी स्वामी होता है। जैसे कि प्रथम भाव मेष राशि का है तो उसका स्वामी मंगल होगा और यही ग्रह भावेश भी कहलाता है।
- घर में स्थित ग्रहों की स्थिति जानें- कौन-से घर में कौन-कौन से ग्रह मौजूद हैं? ग्रह की क्या स्थिति है, बली या कमजोर है, और ग्रहों की दृष्टि से इन खगोलीय पिंडों का प्रभाव तय किया जाता है।
- राशियों की भूमिका समझें- प्रत्येक राशि का स्वभाव उसके घर के पहलुओं और क्षेत्रों को प्रभावित करता है।
- ग्रह दृष्टियों का विश्लेषण करें- Kundli chart में कौन-कौन से ग्रह किस किस भाव को किस दृष्टि से देख रहे हैं, दृष्टि को जानना और समझना बेहद ज़रूरी होता है।
- गृह युतियों का विश्लेषण करें- कौन-कौन से भाव में एक से अधिक ग्रह बैठे हैं। मित्र ग्रह बैठे हैं या शत्रु ग्रह बैठे हैं इसका ज्ञान बहुत जरूरी होता है। जब किसी ग्रह में एक से अधिक ग्रह मौजूद हो तो इसे ग्रह युति कहते हैं।
- कुंडली के योग, दोष का अध्ययन करें- एक से अधिक ग्रह जब कुंडली के किसी भाव में बैठे हों, तो इस प्रकार की परिस्थितियों में अनेक शुभ और अशुभयोग कुंडली में बनते हैं। इनका प्रभाव कुंडली में मिलने वाले शुभ और अशुभ फल पर बहुत अधिक पड़ता है।
द्वादश भावों से विचारणीय विषय
Kundli Chart के 12 घरों का संक्षिप्त परिचय
भारतीय वैदिक ज्योतिष (Vedic Astrology) में Kundli को व्यक्ति के जीवन से संबंधित जन्म समय का खगोलीय नक्शा माना जाता है, जिसमें जन्म समय पर खगोल में ग्रहों, राशियों और नक्षत्रों की स्थिति अंकित होती है। 12 राशियों के आधार पर इसमें 12 घर या भाव बने होते हैं। प्रत्येक घर हमारे जीवन के किसी निश्चित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।
ज्योतिष शास्त्र के विद्वानों ने बड़े ही गहन अध्ययन के बाद प्रत्येक भाव के लिए कुछ विशेष क्षेत्रों या पहलुओं को निश्चित किया है। इन्हीं निश्चित क्षेत्रों या पहलुओं के आधार पर प्रत्येक भाव का अध्ययन और विश्लेषण किया जाता है। प्रत्येक भाव में मौजूद ग्रहों, राशियों और उन पर पड़ने वाली ग्रह दृष्टियों और भाव में होने वाली युतियों के आधार पर उस भाव के फल को जानने का प्रयास किया जाता है।
जातक अलंकार में अंकित पांचवें श्लोक में भाव का परिचय बड़े ही सुंदर ढंग से दिया गया है जैसे कि-
देहो द्रव्यपराक्रमौ सुखसुतौ शत्रुः कलत्रं मृति -भग्यं राज्यपदं क्रमेण गदिता लाभव्ययौ लग्नतः। भावा द्वादश तत्र सौख्यशरणं देहं मतं देहिनां, तस्मादेव शुभाशुभाख्यफलज: कार्यो बुधैर्निर्णयः।। जातकालंकार, प्रथम अध्याय, पृष्ठ -13, श्लोक-5
अर्थात- भावों के नाम इस प्रकार हैं प्रथम- देहो, द्वितीय- द्रव्य, तृतीय- पराक्रमौ, चतुर्थ- सुख, पंचम- सुतौ, षष्ठम- शत्रु, सप्तम- कलत्रं, अष्टम- मृति, नवम्- भाग्यं, दशम- राज्यपदं, एकादश- लाभ, द्वादश- व्ययौ । इस प्रकार यह 12 भाव होते हैं, इनमें सबसे प्रमुख प्रथम स्थान को सुख का भाव माना गया है। अतः ज्योतिष आचार्य को पहले भाव से ही मनुष्य के शुभ और अशुभ फल का निर्णय करना चाहिए।
आइए डिटेल में प्रत्येक भाव से संबंधित पहलुओं के विषय में जानते हैं। कौन-से भाव से किस विषय की जानकारी प्राप्त की जाती है। सरल और व्यवस्थित तरीके से हर भाव को समझने का प्रयास करते हैं।
1. प्रथम स्थान तनु भाव

इसे लग्न भाव या तनु भाव भी कहते हैं, जो कुंडली का पहला घर होता है। इंग्लिश में इसे Ascendant and 1st House of Birth Chart कहते हैं।
- लग्न भाव से संबंधित विचारणीय विषय और क्षेत्र-जातक का व्यक्तित्व, स्वभाव, शारीरिक स्थिति, कद का छोटा या बड़ा होना, वर्ण व रंग-रूप, चेहरे की आकृति, बुद्धि की स्थिति, सम्मान, निंदा, अहंकार, उम्र का प्रमाण, यश और कीर्ति, आत्मा का ज्ञान, आरोग्यता, अज्ञान, निद्रा, दुख और सुख, उम्र की स्थिति, संपत्ति, प्रवास की स्थिति, पूर्व जन्म की स्थिति, लाइफस्टाइल, शरीर के चिन्ह, विचार व स्वभाव इत्यादि विषयों पर विचार किया जाता है।
- जरूरी बात- अगर लग्न भाव में मिथुन, कन्या, तुला, कुंभ, राशियों में से कोई मौजूद हो तो जातक को बलशाली कहना, परन्तु जातक के बल और जीवन के शुभ और अशुभ का अनुमान लग्नेश के बल के अनुरूप कहना चाहिए।
- मजबूत भाव स्थिति- अगर लग्न भाव शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, शुभ ग्रह मौजूद हो, या शुभ ग्रहों की युति हो रही हो। इस प्रकार की परिस्थितियों में लग्न भाव को मजबूत माना जा सकता है, परिणाम स्वरूप ऐसा जातक जीवन में बहुत आगे बढ़ता है।
- कमजोर भाव स्थिति- अगर लग्न भाव में पाप ग्रह या क्रूर ग्रह उपस्थित है या इसी प्रकार के ग्रहण की दृष्टि पड़ रही है या युक्ति हो रही है तो इसे कमजोर स्थिति मान सकते हैं। जातक के जीवन पर इसके नकारात्मक प्रभाव पढ़ते हैं। शारीरिक बनावट में कुछ कमियां रह जाती है। संघर्ष पूर्ण जीवन गुजरता है।
- Tip: लग्न भाव का विश्लेषण करने से पहले लग्न पर पढ़ने वाले दूसरे ग्रहों के प्रभाव का अध्ययन जरूर कर लें जैसे की कौन-कौन से ग्रहों की दृष्टि पड़ रही है, लग्नेश कौन से भाव में बैठा है इत्यादि।
2. द्वितीय स्थान अर्थ भाव
इसे धन भाव भी कहते हैं, जो कुंडली का दूसरा घर होता है, अंग्रेजी में इसे 2nd House के नाम से जाना जाता है।

- प्रमुख विचारणीय क्षेत्र और विषय- धन संपत्ति, पैतृक धन, ज्ञान और विवेक, फैमिली, दाहिनी आंख, नाक, इकट्ठा किया गया धन, सुख का भोग, चांदी और सोना, मोती, माणिक्य, मुंगा, रत्नों पर विचार, दुख पर विचार, खरीदना और बेचना, वाणी, खाना, बर्तन कपड़े, चेहरा, जीभ, दाई आंख, परिवार, मामा, मौसी, नौकर, गर्दन इत्यादि पर विचार इस भाव से किया जाता है।
- महत्वपूर्ण बात- ऊपर दिए गए सभी विषयों के अलावा इस भाव से मित्रता का विचार और कुल की परंपरा का विचार और आर्थिक स्थिति बोलने के तरीके और बचपन के बारे में भी विचार किया जाता है। इस भाव में सबसे अशुद्ध फल मंगल प्रदान करता है।
- शुभ ग्रह स्थिति- इस भाव में शुभ ग्रह होने पर शुभ फल प्राप्त होता है। अगर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो फल उत्तम प्रकार का प्राप्त हो जाता है। इस भाव में राहु पर अगर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो अचानक से धन लाभ होने की संभावना बढ़ जाती है।
- अशुभ ग्रह स्थिति- अगर पाप ग्रहों और क्रूर ग्रहों की मौजूदगी इस भाव में हो तो असफलता प्राप्त होती है। जैसे अगर राहु इस भाव में खराब फल देता है, जो वाणी और धन में अस्थिरता का कारण बनता है। मंगल ग्रह इस भाव में सबसे ज्यादा अशुभ फल देने वाला माना गया है।
- टिप- यह हमेशा ध्यान रखें कि अन्य ग्रहों की दृष्टि और स्थिति भी इस भाव में मौजूद ग्रहों के प्रभाव को कम या ज्यादा कर सकती है। कुंडली के अन्य भागों और योगी के अध्ययन के उपरांत ही द्वितीय भाव के फल का निर्णय लें।
3. तृतीय भाव या स्थान
इस स्थान को जातक अलंकार के अनुसार पराक्रम भाव के रूप में भी जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे 3rd House कहते हैं। इसे सहोदर इत्यादि नामों से भी जाना जाता है, जिनका वर्णन आगे एक सारणी में दिया गया है।

- पराक्रम भाव के अंतर्गत विचारणीय पहलू- इस भाव के अंतर्गत पराक्रम, छोटे बहन-भाई, चाचा-ताऊ, नौकर, साहस, खांसी और दमा, मित्रता, धैर्य, रहन-सहन, सहनशीलता, उद्योग धंधे, हाथ, कंठ, वस्त्र, कम्युनिकेशन स्किल्स, योगाभ्यास और ध्यान, दवाइयों की जानकारी, इत्यादि विषयों पर विचार किया जाता है।
- महत्व की बात- ज्योतिषाचार्य मुख्य रूप से इस भाव का अध्ययन जातक के साहस, संघर्ष की क्षमता और उसके द्वारा की जाने वाली छोटी-छोटी यात्राओं पर विचार करने के लिए भी करते हैं।
- शुभ ज्योतिष संकेत- इस भाव में शुभ ग्रहों की मौजूदगी और दृष्टि हमेशा शुभ परिणाम देती है, इस भाव में शुभ ग्रह जितना बलशाली होगा उतना ही शुभ फल मिलेगा जैसे कि मंगल ग्रह यहाँ अगर बलवान हो तो जातक का पराक्रम बढ़ता है।
- अशुभ ज्योतिष संकेत- अगर इस भाव में अशुभ, पाप ग्रह स्थित हों, तो निश्चित ही अशुभ फल की प्राप्ति होती है। जैसे- अगर इस भाव में शनि, राहु, केतु में से कोई स्थित हों या दृष्टि डाल रहे हों, तो जातक के पराक्रम को क्षिण कर सकते हैं।
- टिप- फलक्थन से पहले इस घर में मौजूद ग्रहों के बल की जानकारी होनी बहुत जरूरी है। निर्बल ग्रह अच्छा परिणाम नहीं देते, जबकि बलशाली ग्रह हमेशा अच्छा परिणाम देते हैं।
4. चतुर्थ स्थान
कुंडली के चतुर्थ स्थान पर मौजूद इस घर को सुख के भाव से जाना जाता है, अंग्रेजी भाषा में इसे 4th House the birthchart कहा जाता है। केंद्र स्थान में आने वाले इस भाव को ही हिबुक, मातृ इत्यादि नामों से भी संबोधित किया जाता है।

- चतुर्थ स्थान से विचारणीय क्षेत्र- यह स्थान मुख्य रूप से माता के सुख-दुख, मृत्यु का विचार,व्यक्ति का स्वभाव, जाति, प्रिय मित्र, ससुर, वंश, तालाब, कुआं, भूमि के अंदर दबा हुआ खजाना, चौपाया, औषधि, रसायन शास्त्र, जनता, खाने के पदार्थ, स्वयं का दुख-सुख, हाथ की कला, कपट, दिल, कंधा, छाती, पेट, साझेदारी, भवन, विद्या, भूमि, माता का स्वास्थ्य, पूर्व जन्म में अर्जित पुण्य, सुख और ऐश्वर्य, वाहन और सवारी, कृति, पेट की बीमारी, मानसिक शांति, आदि विषयों पर जानकारी प्रदान करता है।
- सुख भाव का महत्व- यह भाव मुख्य रूप से घरेलू सुख, भूमि संपत्ति और भावनात्मक सुरक्षा के विषय को उजागर करता है। इस भाव को सबसे अधिक चंद्रमा और बुद्ध प्रभावित करते हैं क्योंकि यह दोनों ग्रह इस भाव के कारक ग्रह कहलाते हैं।
- शुभ संकेत- अगर चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह स्थित है और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही है तो सर्वदा शुभ फल प्राप्त होता है इस भाव में सबसे अच्छा फल चंद्रमा और बुध ग्रह देते हैं। अगर यह भाव चंद्रमा या बुध से युक्त है या इस भाव पर इन दोनों ग्रहों की दृष्टि है तो सुख में वृद्धि होती है।
- अशुभ संकेत- अगर सुख भाव पर पाप ग्रहों या क्रूर ग्रहों की दृष्टि पड़ रही है, या ये ग्रह इस भाव में स्थित हैं, तो अशुभ फल की संभावना बढ़ जाती है।
- विशेष टिप- इस भाव में चंद्रमा जितना बाली होता है उतना ही शुभ परिणाम इस भाव से प्राप्त होता है। अगर इस भाव में मौजूद चंद्रमा या बुध कम बलशाली हों तो ज्योतिषीय उपायों को अपनाकर इन ग्रहों के बल को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए रत्न धारण किए जा सकते हैं, या इन ग्रहों से संबंधित मंत्रों द्वारा पूजा पाठ किया जा सकता है।
5. पंचम स्थान सुत भाव
कुंडली के पांचवें स्थान को सुत भाव, विद्या और संतान भाव कहा गया है। पश्चिमी ज्योतिष में इसे 5th हाउस ऑफ द बर्थ चार्ट के रूप में जाना जाता है। भारतीय ज्योतिष में इसे कहीं अन्य नाम से भी संबोधित किया जाता है जैसे की देवराज, धी इत्यादि। सभी नाम को जानने के लिए सारणी देखें।

- विचारणीय क्षेत्र- मूल रूप से इस भाव के द्वारा संतान, जातक की बुद्धि, विवेक और ज्ञान, गर्भ की स्थिति, पेट, पुत्र-पुत्री, देवताओं का सामर्थ्य, देव भक्ति, शिक्षा, जठर की अग्नि, गर्भाशय, जातक की योग्यता, शास्त्रों का ज्ञान, लॉटरी, टेक्निकल नॉलेज, याद करने की क्षमता, प्रबंधन गोपनीयता जातक का स्वभाव यंत्र-मंत्र की सिद्धि लॉटरी और सट्टे का विचार Heart और back प्रॉब्लम का विचार, बोलने की कुशलता, लिखने की कुशलता, विद्या, बुद्धि, संतान से प्राप्त होने वाला सुख, इत्यादि सभी पहलुओं पर विचार किया जाता है।
- विशेष महत्व- ज्योतिषाचार्य जातक की रचनात्मकता, प्रेम जीवन, और भविष्य के कर्मों का संकेत भी इसी पंचम भाव से प्राप्त करते हैं।
- पंचम भाव के शुभ संकेत- पंचम भाव में शुभ ग्रहों जैसे की बुद्ध शुक्र चंद्रमा बृहस्पति की मौजूदगी शुभ फल का संकेत देती है अगर इन पर किसी दुष्ट ग्रह की दृष्टि नहीं पड़ रही हो तो। शुभ ग्रहों की दृष्टि शुभ परिणाम को और अधिक प्रभावशाली बनाती है। इस भाव में शुभ ग्रहों की दृष्टि से या शुभ ग्रहों से युक्त राहु जातक के लिए उच्च शिक्षा में नए अवसरों को प्रदान कर सकता है।
- अशुभ संकेत- अगर इस भाव में अशुभ ग्रह स्थित है या क्रूर ग्रह स्थित है और उन पर पाप ग्रहों या करो ग्रहों की दृष्टि है तो इस भाव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और नकारात्मक ही परिणाम प्राप्त होते हैं। जैसे अगर इस भाव में राहु ग्रह मौजूद है और उसे पर क्रूर या पाप ग्रहों की दृष्टि है तो प्रेम संबंधों में बाधा उत्पन्न होती है।
- विशेष टिप- इस भाव को कभी हल्के में ना ले क्योंकि इस भाव से जातक के ज्ञान अर्जन की क्षमता प्रेम और उसकी संतान से जुड़ी जिम्मेदारियां संबंध रखती हैं। इस भाव से जुड़ी एक घटना में आपके साथ साझा करना चाहता हूं।
2023 में एक दंपती जोड़ा मेरे पास आया, जिनकी शादी को 4 साल हो चुके थे। अभी तक निसंतान थे। जब उनकी कुंडली में मैंने विश्लेषण किया तो पाया की दोनों पति-पत्नी की कुंडली के पंचम भाव में पाप ग्रह मौजूद हैं। लड़के की कुंडली के पंचम भाव में शनि के साथ राहु बैठा है, जबकि लड़की की कुंडली के पंचम भाव में केतु ग्रह मौजूद है, तो इस स्थिति से मैंने जाना की संतान प्राप्ति में देरी और प्रथम संतान कन्या होगी। और परिणाम स्वरुप ऐसा ही हुआ। शादी के 5 साल के बाद घर में कन्या का आगमन हुआ।
6. षष्ठम स्थान रिपु भाव
इस भाव को रिपु (बैरी ) के अलावा रोग और ऋण भाव भी कहते हैं। अंग्रेजी में यह 6th House के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा इस भाव को भय का भाव भी कहा गया है।

- षष्ठम भाव के अंतर्गत विचारणीय क्षेत्र और विषय- इस भाव का मुख्य रूप से विश्लेषण जातक के रोग, ऋण और शत्रुओं के विषय में विचार करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा इस भाव से चोट, दुर्व्यवहार, अरिष्ट, चिंता, व्यसन, मामा से संबंध, चोरी, नुकसान, डर, सेवक, भूमि, सौतेली मां, अशुभ कार्य, नुकसान, लोगों से मनमुटाव, चाचा के बारे में, पैरों, कमर, नाड़ी, नाभी, उदर, धोखा, सेवाभाव, इत्यादि पहलुओं की जानकारी प्राप्त होती है।
- छठे भाव का महत्व विशेष- ऊपर से लिखित सभी विषयों और नक्षत्र के अलावा इस भाव से व्यक्ति के संघर्ष, मुकाबले की क्षमता, स्वास्थ्य की स्थितियाँ, बीमारियों के कारण इत्यादि की जानकारी भी हासिल की जाती है।
- शुभ संकेत- अगर इस भाव में शुभ ग्रह बैठे हो और उन पर शुभ ग्रहों की ही दृष्टि हो तो हमेशा शुभ फल ही प्राप्त होते हैं स्वास्थ्य ठीक रहता है बीमारियां आने की संभावनाएं कम हो जाती हैं। दुश्मनों से हानि नही होती है। शुभ ग्रह जैसे बुध और शुक्र इस भाव में बैठे हो या दृष्टि डाल रहे हो तो आने वाले विपत्तियां पर विजय मिलती है।
- अशुभ संकेत-अगर छठे भाव में पाप ग्रह या क्रूर ग्रह विद्यमान हो और उन पर इसी प्रकार के ग्रहों की दृष्टि हो या युति हो तो जातक का स्वास्थ्य खराब रहता है बीमारियां उसको पड़े रहती हैं दुश्मनों से घिरा रहता है। जैसे कि अगर शनि इस ग्रह में बैठा हो और उसे पर सूर्य की दृष्टि हो तो जातक को मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अगर शनि के साथ राहु है तो उधर संबंधित बीमारियां आती हैं।
- विशेष सुझाव- रितु भाव में अगर शुभ ग्रह जैसे बुध या शुक्र बैठे हों परंतु निर्बल हो तो उनको बलशाली करने के उपाय करने चाहिए। उपाय करने से आने वाली विपत्तियों को कमजोर किया जा सकता है। बुध और शुक्र को मजबूत करने के लिए रतन धारण किया जा सकते हैं जैसे की बुद्ध के लिए पन्ना और शुक्र के लिए हीरा या पुखराज धारण करना सही रहता है। इसके अलावा मित्रों के साथ पाठ पूजा करने से भी इन ग्रहों को बल मिलता है।
7. सप्तम स्थान या दांपत्य भाव
कुंडली के स्थान को विवाह भाव के रूप में जाना जाता है और इसे दांपत्य और प्रणय भाव भी कहते हैं। अंग्रेजी भाषा में इसे 7th House कहते हैं। शास्त्रों में ऐसे अनेक संख्या दी गई है जैसे की जामित्र, गमन, कलत्रं इत्यादि।

- विवाह भाव के प्रमुख सोचनीय क्षेत्र और विषय- इस भाव से पति-पत्नी का स्वरूप, जीवनसाथी का स्वभाव, गुण, व्यवसाय, व्यापार, धर्म, स्त्री की मृत्यु, कामवासना, पितामह, भतीजा-भतीजी, विवाद, झगड़े, बिजनेस, ट्रैवलिंग, संगीत, दूध और दही, गुदा संबंधित रोग, काम चिंता, गुप्त इंद्रियां, विवाह की स्थिति, व्यवसाय की स्थिति, साझेदारी, नारी के गुण और अवगुण, बवासीर, भतीजों के साथ रिश्ते और हाथ से दिए गए धन के बारे में विचार किया जाता है।
- विशेष महत्व- मुख्य रूप से इस भाव के द्वारा वैवाहिक संबंधों, व्यापारिक साझेदारियों और सामाजिक रिश्तों से संबंधित जानकारियां जुटाने का प्रयास किया जाता है।
- सप्तम भाव के शुभ संकेत- शुभ ग्रह ऑन की मौजूदगी इस भाव के बल को बढ़ा देती है। और अगर ऊपर से शुभ ग्रहों की दृष्टि भी पड़ रही हो तो परिणाम बहुत ही शुभ प्राप्त होते हैं। जैसे कि अगर शुक्र ग्रह इस भाव में बैठा है और ऊपर से उसे पर बुद्ध की दृष्टि पड़ रही है तो दांपत्य जीवन में अपार खुशियां मिलती हैं। जीवनसाथी प्रेम करने वाला और खुशियां देने वाला होता है।
- अशुभता के संकेत- अगर सातवें भाव में अशुभ ग्रह विद्यमान है और ऊपर से उन पर क्रूर या पाप ग्रहों की दृष्टि है तो यह अशुभ परिणाम के संकेत होते हैं दांपत्य जीवन में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। जैसे की अगर इस घर पर शनि, राहु और केतु, प्रभाव डाल रहे हों तो विवाह विच्छेद की संभावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं।
- विशेष सलाह- अगर इस भाव पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो या युक्ति हो तो प्रबल संभावना बनती है की वैवाहिक जीवन में तनाव उत्पन्न होगा। संबंध विच्छेद की संभावना भी बन सकती है। इसके लिए इस भाव के कारक ग्रह शुक्र को मजबूत करने के प्रयास करने चाहिए इसके लिए शुक्र ग्रह से संबंधित रतन को धारण करना उत्तम रहता है शुक्रवार के व्रत भी अच्छे परिणाम देते हैं।
8. अष्टम स्थान या आठवां भाव
जन्म कुंडली के आठवें भाव को ‘आयु भाव’ के रूप में भी जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे 8th हाउस ऑफ़ द बर्थ चार्ट कहते हैं। भारतीय ज्योतिष में इस भाव को कुछ अन्य नाम से भी जाना जाता है जैसे कि- मृत्यु भाव, रण भाव विनाश भाव इत्यादि।

- अष्टम भाव से विचारणीय क्षेत्र और विषय- इस भाव के माध्यम से आयु और मृत्यु का विचार किया जाता है, साथ में आकस्मिक धन लाभ, जेल जाना, व्याधि, मृत्यु स्थान, पूर्व जन्म, अगला जन्म, पितृऋण, गुप्त मार्ग, दंड, अपमान, पद की हानि, बड़ी बहन का पुत्र, पत्नी की ओर से लाभ प्राप्ति, स्त्री लाभ, सांप का डसना, अन्य विकार, मानसिक समस्या, मनोव्यथा, घात, जननेन्द्रिय व गुप्तांगो के रोग, जय-पराजय, दुश्मन का डर, आकस्मिक लाभ, व्यसन कर्जदार होना इत्यादि विषय पर विचार किया जाता है मृत्यु, रहस्य, गूढ़ विद्या, आकस्मिक घटनाएँ।
- अष्टम भाव का महत्व विशेष- हालांकि इस भाव को अशुभ माना जाता है, लेकिन कंई मामलों में जब यह भाव शुभ ग्रहों से युक्त होता है जैसे कि खासकर बुध, गुरु और शुक्र, तो इस भाव के द्वारा जीवन के बड़े-बड़े परिवर्तनों और गुप्त शक्तियों को प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
- अष्टम के शुभ संकेत- इस भाव में शुभ ग्रह जैसे कि शुक्र बुध और बृहस्पति बैठा हो या आपस में एक दूसरे से युक्त हो तो शुभ लाभ प्राप्त होते हैं जैसे की व्यक्ति की प्रवृत्ति धार्मिक हो जाती है वह विश्व विख्यात होता है राजा का प्रिया बनता है।
- मृत्यु भाव अशुभ संकेत- अष्टम भाव को वैसे दुर्भाग्य या अशुभता का प्रतीक माना जाता है, इस भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति भाग्यहीन रहता है, हालांकि वह सदा बुद्धिमान होता है। इस घर को पाप ग्रह, क्रूर ग्रह अत्यधिक बल से प्रभावित करते हैं और अशुभ फल देते हैं, जैसे कि अगर इस घर में बली चंद्रमा हो तो अल्पायु में ही मृत्यु योग बनता है। अगर इस भाव मे मंगल ग्रह है, तो मांगलिक दोष उत्पन्न होता है, जिससे विवाह में बाधाएं उत्पन्न होती है। राहु केतु ग्रह व्यक्ति को शारीरिक रूप से परेशान करते हैं जिससे स्वास्थ्य खराब रहता है।
- टिप विशेष- अष्टम भाव में अगर सभी ग्रह अशुभ हों तो शनि ग्रह की विशेष उपासना करनी चाहिए, क्योंकि यह कर्म का देवता है, जो व्यक्ति को कर्मवीर बनाता है। कर्म प्रधानता के कारण स्वास्थ्य को भी सुधारने का काम करता है शनि की उपासना करने से विशेष लाभ मिलता है। हालांकि शनि भी पाप ग्रह की श्रेणी में आता है परंतु यह इस भाव का कारक ग्रह है इसलिए यह शुभ प्रभाव भी कई बार छोड़ता है।
9. नवम स्थान भाग्य का घर
9th भाव को कुंडली में भाग्य स्थान के तौर पर जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इस भाव को 9th House of birthchart कहते हैं। भाग्य भाव के अलावा इस स्थान को अन्य नामों से भी जाना जाता है जैसे कि- धर्म स्थान या शुभ स्थान इत्यादि।

- नवम भाव से विचारणीय विषय- इस भाव के द्वारा जातक के भाग्य, गुरु, धार्मिक स्थिति, पाप पुण्य, दैविक शक्ति, प्रारब्ध, ऐश्वर्य, तीर्थ यात्रा, मठ-मंदिर, वापी-कूप, विदेश यात्रा, वैभव, देशभक्ति, तत्वज्ञान, गुरु भक्ति, चित की शुद्धि, दयादान, तप व योग साधना, नम्रता, नीति, लंबी यात्रा, न्याय, स्वप्न, परिवार, जांघ, यंत्र-मंत्र-तंत्र साधना, पिता का सुख, दान, भाग्योदय, इत्यादि पहलुओं पर विचार किया जाता है।
- भाग्य भाव का विशेष महत्व- ज्योतिषाचार्य विशेष रूप से इस भाव के द्वारा जातक के जीवन में आध्यात्मिकता, उच्च शिक्षा और सौभाग्य को जानने का प्रयास करते हैं। इस भाव में शुभ ग्रहों के प्रभाव जातक के जीवन में तरक्की को एक्टिवेट करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
- नवम भाव के शुभ संकेत- इस भाव में पाप ग्रहों को छोड़कर बाकी सभी ग्रह शुभ फल देते हैं, जैसे की अगर सूर्य इस भाव में है तो वह जातक को धार्मिक, सच बोलने वाला, और दीर्घायु बनाता है। उसका चंद्रमा बलशाली बुध और गुरु व शुक्र जातक को भाग्यशाली बनाते हैं। बृहस्पति इस भाव में सबसे उत्तम फल प्रदान करता है। ़
- धर्म स्थान के शुभ संकेत- चीन का चंद्रमा और मंगल का अन्य पाप ग्रह इस भाव में भी कमजोर परिणाम देते हैं अगर पाप ग्रह जैसे कि राहु, केतु, शनि, इत्यादि एक दूसरे को देख रहे हों तो ओर अधिक दुष्ट परिणाम मिलते हैं जातक के भाग्य का नाश करते हैं। जैसे नवम भाव का मंगल जातक को अस्वस्थ करता है। शनि जातक को कपट करने वाला, धर्म रहित, बनाता है। राहु और केतु भी इस भाव में स्थित होने पर जातक को दरिद्र, क्रोधी, अधर्मी, पापकर्मी, बनाते हैं।
- विशेष सलाह- इस भाव के शुभ प्रभावों को बढ़ाने के लिए इसके कारक ग्रहों बृहस्पति और सूर्य को मजबूत करने के उपाय करने चाहिए, जिससे कि इस पर इस भाव में मौजूद पाप ग्रहों के प्रभाव क्षिण हो जाते हैं। इन ग्रहों को मजबूत करने के लिए इनसे संबंधित रत्न धारण करना चाहिए, और पूर्ण विधि विधान से इनका व्रत और पूजा पाठ कर सकते हैं।
10. दशम भाव कर्म का विचार स्थान
Birth Chart के इस 10 वें स्थान को कर्म के भाव के रूप में जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे 10th House कहते हैं। इसे कंई अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे कि मेषुरण, आस्पद और व्यापार भाव इत्यादि।

- दशम भाव के प्रमुख विचारणीय क्षेत्र- इस भाव के अंतर्गत राज्य में सम्मान, जातक की समाज में प्रतिष्ठा, करियर, नौकरी और व्यापार, राज्य के कार्य, राजनीतिक पावर, उन्नति, मान-सम्मान कीर्ति, यज्ञादि शुभ कार्य, शिल्पचातुर्य, उपजीविका, व्यवसाय, कार्य की सिद्धि, निवास, मानहानि, विदेश जाना, जातक के पिता का रूप रंग, कमर और जानु का विचार, जातक की वृति एवं पात्रता, बदलाव, परीक्षाओं की स्थिति, आजीविका का साधन, जीवन शैली का स्तर, इत्यादि विषयों पर विचार किया जाता है।
- कर्म भाव का महत्व विशेष- जातक के करियर से संबंधित विश्वसनीय जानकारी प्राप्त करने के लिए इस भाव का अध्ययन करते हैं। भविष्य में जातक किस प्रकार के कार्य द्वारा अपना जीवन यापन करेगा और आजीविका चलाएगा इसी भाव के द्वारा ज्ञात किया जाता है। इसके अलावा जातक के कर्म और सामाजिक स्थिति का अनुमान भी इसी भाव से लगाया जाता है।
- शुभ संकेत– इस भाव में लगभग सभी ग्रह अच्छे फल प्रदान करते हैं, जैसे कि सूर्य जातक को राजा का प्रिय बनाता है, कीर्ति प्राप्त होती है। बुद्धि भी श्रेष्ठ होती है, और भी अन्य अच्छे फल प्राप्त होते हैं, लेकिन सूर्य के कुछ असंतोषजनक फल भी प्राप्त होते हैं। वैसे ही चंद्रमा अगर बली है, तो जातक को सद्गुरु, धन संपन्न, और लोगों का प्रिय बनाता है। इसी प्रकार मंगल ग्रह जातक को बड़ा प्रतापी, पुत्रवान, परोपकारी, सुंदर बनाता है। निर्बल स्थिति का मंगल थोड़ा अशुभ प्रभाव भी डालता है, जैसे कि जातक के स्वभाव को क्रोधी करना। बुध, गुरु, शुक्र भी सदा अच्छे फल प्रदान करते हैं।
- अशुभ संकेत- इस भाव में केवल कुछ पाप ग्रह जैसे कि शनि, राहु और केतु अगर नीच स्थिति में हैं, तो जातक के करियर में बाधाएं उत्पन्न करते हैं। राहु थोड़ा कम अशुभ प्रभाव डालता है, खासकर जातक के स्वास्थ्य को बिगाड़ता है, जबकि केतु का फल थोड़ा ज्यादा कष्ट देने वाला होता है। केतु अच्छे कार्यों में हमेशा विघ्न डालने वाला होता है। अशुभ स्थिति के केतु के कारण गुदा रोग हो सकता है। जातक को अपवित्र कार्य करने वाला भी बनाता है। अगर ये दोनों ग्रह शुभ ग्रहों से युक्त हों, या दृष्ट हों तो उनके प्रभाव ज्यादा मायने नहीं रखते हैं ये शुभ ग्रहों के अनुरूप ही फल देते हैं।
- स्पेशल टिप- इस भाव में अगर अशुभ ग्रह विद्यमान हो तो उनके प्रभाव को कम करने के लिए भावेश या इस भाव के कारक ग्रहों सूर्य, बुध, गुरु और शनि को मजबूत करना चाहिए।
11. एकादश भाव लाभ स्थान
कुंडली के 11वें स्थान को लाभ और आय के भाव के रूप में जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे 11th House कहते हैं। इसके अलावा भी इसे भारतीय ज्योतिष में कुछ अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे कि उपान्त्य, आय भाव इत्यादि।

- एकादश भाव से विचारणीय प्रमुख क्षेत्र या विषय- इस भाव से मुख्यतः आय या लाभ का विचार किया जाता है। इसके अलावा इससे धन प्राप्ति के स्रोतों पर भी विचार किया जाता है, जैसे प्रॉपर्टी से होने वाले लाभ, धन प्राप्ति के प्रकार, वस्त्र, आभूषण, वाहन बड़ा भाई, बड़ी बहन, दोस्त, परिवार, पुत्री, इच्छापूर्ति, बयान, बायां हाथ, पिंडली व टखना, दांया पैर, पुत्री व सगे संबंधियों से होने वाले लाभ, आकस्मिक होने वाले लाभ, इच्छाओं की पूर्ति, मित्र, भाई, मोटर गाड़ी, समाज में प्रतिष्ठा, श्रेष्ठता, सुख, जमीन जायदाद का योग, मांगलिक कार्य, इत्यादि पर विचार किया जाता है।
- विशेष महत्व- आचार्य मुख्य रूप से इस भाव के द्वारा जातक के धन आवागमन के विषय को समझने का प्रयास करते हैं। इसमें उन स्रोतों की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है, जिनसे भविष्य में जातक को धन लाभ होगा। उसके अलावा समाज में उसकी प्रतिष्ठा कैसी रहेगी, इसकी भी जानकारी प्राप्त की जाती है।
- भाव के शुभ संकेत- इस भाव में शुभ ग्रह जितने ज्यादा बलशाली होंगे, उतना ही लाभ होगा। जितने ज्यादा शुभ लक्षण होंगे, उतने ही धन प्राप्ति के योग बनेंगे। जैसे की अगर इस भाव में मेष राशि है और शुभ ग्रह जैसे की गुरु और शुक्र विराजमान है, तो चतुष्पदो से संबंधित व्यापार, सरकार में सेवा, इत्यादि से लाभ प्राप्ति के संकेत प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार से अन्य ग्रहों और राशियों के सहयोग से अनुमान लगाया जा सकता है, कि भविष्य में जातक को धन लाभ कहां से और कैसे प्राप्त होगा।
आने वाले दिनों में संभावना है कि एक लेख जरूर आएगा, जिसमें बताने का प्रयास किया जाएगा, कि कौन सी राशि किस भाव में क्या फल देती है।
- अशुभ संकेत- यह भी बिल्कुल आसान है कि अगर इस भाव में अशुभ ग्रह बैठे हैं और उन पर अशुभ ग्रहों की ही दृष्टि है और क्रूर राशि का साथ है, तो अशुभ परिणाम प्राप्ति के चांस बढ़ जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में धन लाभ के स्रोतों पर खतरा मंडराता है, या फिर कोई आकस्मिक परिवर्तन होने वाला होता है जो लाभ और आय को प्रभावित करेगा।
आपको बता दूं कि कंई बार राहु खगोलीय परिस्थितियों के कारण ऐसे योग बनाता है कि व्यक्ति को अचानक से धन की प्राप्ति होती है, तो यह जरूरी नहीं है पाप ग्रह हमेशा अशुभ फल दें। यही कारण है कि, कुंडली के इस भाव को समझने के लिए इसके अन्य भावों से संबंधों को समझना भी उतना जरूरी हो जाता है, जितना कि इस भाव को।
- विशेष टिप- इस भाव में जितने ज्यादा शुभ लक्षण दिखाई देंगे, उतने ही ज्यादा लाभकारी और शुभ प्रणाम प्राप्त होंगे। शुभ लक्षण से मेरा मतलब है की इस भाव में जितने ज्यादा शुभ ग्रह बैठेंगे, या शुभ ग्रहों की दृष्टि होगी, या शुभ ग्रहों की युति होगी, या कोई शुभ योग इस भाव में बन रहा होगा, जैसे की राजयोग, दुरुधरा योग सुनफा योग इत्यादि।
12. द्वादश स्थान रिष्फ भाव
बारहवें घर को कुंडली में व्यय के भाव या खर्चे के स्थान के तौर पर जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे 12th House of Kundli कहते हैं। इसके अलावा भारतीय ज्योतिष में इसके अन्य नाम भी है जैसे कि रिष्फ भाव और अन्त्य स्थान इत्यादि।

- अन्त्य स्थान से विचारणीय पहलू या विषय- द्वादश भाव से जिन विषयों पर विचार किया जाता है वो हैं- खर्चे वाले कार्य, व्यय, दुराचार, मोक्ष, व्यसन, विदेश यात्रा, बायां नेत्र, दोनों पैर, शुभ अशुभ कार्य का खर्चा, जेल की सजा या कोई दंड, गुप्त छुपा हुआ शत्रु, अंग भंग, गरीबी, वाहन भंग, कारागार, अनिद्रा, राजदंड, विदेश व्यापार, स्वर्ग और नरक, मोक्ष और मुक्ति, गुप्त विद्या, पैतृक संपत्ति पर झगड़ा, बाई आंख, बांया कान, अत्यधिक खर्च का होना, किस विषय पर खर्च होना, मुकदमों पर खर्च, शत्रुओं-दुश्मनों द्वारा धन की हानि, इत्यादि विषयों पर विचार किया जाता है।
- द्वादश भाव का विशेष महत्व- जातक के जीवन में इस भाव का बहुत महत्व होता है। ज्योतिष आचार्य विशेष रूप से इस भाव के द्वारा जातक के जीवन की उन परिस्थितियों को समझने का प्रयास करते हैं, जिनसे प्रभावित होकर जातक धन को खर्च करेगा और कुमार्ग पर चलेगा या सदमार्ग पर चलेगा। इसी के आधार पर तय होगा की उसे क्या मिल रहा है, मानसिक शांति, खर्च, आत्मिक विकास, मोक्ष, या फिर गरीबी, लाचारी जैसे दुष्परिणाम।
- द्वादश स्थान के शुभ संकेत-व्यय भाव में शुभ ग्रहों से शुभ फल प्राप्त होते तो हैं, परन्तु संभावना बहुत ही कम होती है। कौन सी राशि इस भाव में है और किस ग्रह के साथ शुभ संयोग बना रही है, इसी के अनुरूप शुभ फल प्राप्त होते हैं। जैसे की इस भाव में तुला राशि है तो जातक देवताओं और ब्राह्मण को सम्मान देने वाला होता है और इसी कारण वह सेवा कर्मों में बहुत खर्च करता है।
- द्वादश स्थान के अशुभ संकेत- अक्सर देखा गया है कि इस भाव में अशुभ संकेतों की भरमार होती है। इस भाव में पाप ग्रह और क्रूर ग्रह तो अशुभ फल देते ही हैं, साथ में शुभ ग्रहों से भी अनेकों बार अशुभ संकेत प्राप्त होते हैं। जैसे कि ज्योतिषपियूष में लिखा है कि अगर गुरु इस भाव में अगर है तो जातक को बचपन में ही हृदय से संबंधित बीमारी होने की संभावना होती है। जातक संतानहीन, पाप युक्त, गरीब, मूर्ख, निर्लज, इत्यादि होता है। शुभ ग्रहों से अगर इस प्रकार के फल मिलते हैं, तो पाप ग्रहों से मिलने वाले परिणामों को आप समझ सकते हैं कैसे होंगे। कौन से भाव में, कौन सा ग्रह क्या फल देता है? इसके लिए जल्दी आपको एक लेख मिलने वाला है।
- विशेष Tip- द्वादश भाव को समझने के लिए इस भाव में स्थित ग्रहों, भाव पर पड़ने वाली ग्रह दृष्टियों, भाव में होने वाली ग्रह युतियों के अलावा, इस भाव के भावेश के अन्य भावों, ग्रहों के साथ संबंधों का अध्ययन जरूर करें। और देखें की कुंडली में क्या कोई ऐसा योग बन रहा है, जो जातक के लिए शुभ परिणाम देने वाला हो। कहने का तात्पर्य यह है कि इस भाव का अध्ययन जरा ज्यादा सोच विचार कर किया जाना चाहिए।
कुंडली के भावों का गहरा विश्लेषण कैसे करें? (Deep Kundli Analysis Tips)
Birth Chart के सभी houses को बेस्ट तरीके से समझने के लिए संपूर्ण कुंडली के सभी पहलूओं का अध्ययन ध्यान से करें। केवल कुंडली के घरों को ही ना देखे, बल्कि भाव के साथ सभी ग्रहों, राशियों और दृष्टियों का संयोग भी देखें। आइए नीचे दी गई Tips को अपनाकर आप प्रवीणता के साथ कुंडली विश्लेषण करना सीख सकते हैं।
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- प्रत्येक भाव के स्वामी (भावेश) ग्रह को विशेष रूप से समझने का प्रयास करें। अन्य ग्रहों और घरों के साथ उसके संबंधों को जरूर परखें।
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- सभी घरों में बैठे ग्रहों की प्रकृति जरूर समझें और अन्य भावों की स्थिति के साथ कनेक्ट करते हुए ध्यानपूर्वक विश्लेषण करें।
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- शुभ और अशुभ, पाप और क्रूर ग्रहों की अन्य भावों पर पड़ रही दृष्टि को पहचानें और उनके प्रभाव को नोट करें।
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- कुंडली में मौजूद अशुभ ग्रहों के प्रभाव का विश्लेषण भाव, राशि, ग्रह दृष्टियों, युतियों के आधार पर करें।
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- Moon Chart (चंद्र कुंडली) और Navamsa Chart (नवांश कुंडली) का अध्ययन और विश्लेषण उद्देश्य के अनुरूप जरूर करें, जैसे कि अगर कुंडली विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य कारोबार से संबंधित है तो नवांश कुंडली का अध्ययन बहुत मायने रखता है।
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- लग्नेश का विशेष ध्यान रखें और अन्य ग्रहों के साथ उसके संबंधों के शुभाशुभ प्रभाव को जानने का प्रयास करें।
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- केन्द्र भावों में शुभ ग्रहों की स्थिति का विशेष अध्ययन करें। कुंडली के इस स्थान में मौजूद शुभ ग्रहों के परिणाम हमेशा चोंकाने वाले होते हैं।
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- कुंडली में बनने वाले योगों का बहुत महत्व होता है। इस लिए कुंडली विश्लेषण करते समय योगों का गहराई से अध्ययन करें।
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- जन्म से संबंधित बेसिक जानकारी जैसे कि जन्म राशि, नक्षत्र, पाया, गण, वर्ग, समय, इत्यादि का ध्यान जरूर रखें।
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- जिस व्यक्ति की कुंडली का विश्लेषण करने जा रहे हैं, उससे मिलकर व्यक्तिगत रूप से उसे जानने और समझने का प्रयास करें।
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- एक अच्छे ज्योतिषविद् को वर्तमान स्थिति का आंकलन करने के लिए Dasha & Transit (दशा और गोचर) के प्रभावों की जांच जरूर करनी चाहिए।
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- विश्लेषण के उपरांत स्थिति को बेहतर करने के लिए उपाय भी सुझाएं तो क्लाइंट को पसंद आता है। हमेशा ग्रहों की स्थिति के अनुसार ही सकारात्मक उपाय बताएं।
निष्कर्ष
जन्म कुंडली के 12 भाव (Birth chart houses) हमारे जीवन के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को दर्शाते हैं। How to read kundli houses in astrology? इस प्रश्न का उत्तर बड़ा ही सरल है कि, कुंडली के प्रत्येक भाव के स्वामी अर्थात भावेश और उसमें बैठे ग्रहों के प्रभाव व संबंधों का संयुक्त विश्लेषण और व्याख्या करना ही kundli reading की प्रक्रिया है।
कुंडली के सभी 12 भावों का दक्षता के साथ विश्लेषण करने के लिए अभ्यास, धैर्य, और गहन अध्ययन बहुत जरूरी है। Birth Chart ka प्रत्येक house अपने आप में एक अलग कहानी बयां करता है, जो जातक की जिंदगी से जुड़े सभी अहम पहलुओं की महत्वपूर्ण जानकारी होती है।
ज्योतिष शास्त्र में सही तरीके से कुंडली के 12 घरों को पढ़ना सीखकर आप अपने जीवन की संभावनाओं, चुनौतियों इत्यादि को भली भांति समझ सकते हैं। अवांछित परिणाम प्राप्त होने पर अशुभ परिस्थितियों के अनुसार ज्योतिषीय उपायों को अपनाकर जीवन में संतुलन बनाए रखने का प्रयास कर सकते हैं। कुंडली विश्लेषण में पारंगत होने के उपरांत आप चाहें तो कुंडली विश्लेषण और एस्ट्रोलॉजी को अपने करियर के रूप में भी अपना सकते हैं।
तो दोस्तों, नेक्स्ट टाइम जब भी आप अपनी या अपने किसी जानकार की या किसी अन्य व्यक्ति की कुंडली हाथ में लेकर बैठें, तो उपर लेख में बताए गए विचारों और तरीकों को अपनाकर स्टेप बाई स्टेप भविष्य की संभावनाओं और कहानियों को पढ़ और समझ सकते हैं।
FAQ: Read Kundli Houses
कुंडली के 12 भाव से क्या-क्या देखा जाता है?
कुंडली 12 घरों से बना जन्म समय का खगोलीय मानचित्र है, हरेक घर(भाव) व्यक्ति के जीवन से जुड़े पहलुओं को क्रमश: तन, धन, पराक्रम, सुख, संतान, रिपु, जीवनसाथी, मौत, धर्म,कर्म, आय, खर्च अनुसार उजागर करता है।
कुंडली में बारहवें भाव का स्वामी कौन होता है?
12वें भाव में मौजूदा राशि का स्वामी ग्रह ही उस भाव का स्वामी होता है। द्वादश भाव का कारक ग्रह शनि है, जो फिक्स्ड है। कारक ग्रह और स्वामी ग्रह (भावेश) में अंतर होता है। कारक ग्रह निश्चित ग्रह होते हैं भाव के स्वामी कुंडलियों के अनुसार बदलते रहते हैं।
राहु दूसरे भाव में अच्छा है या बुरा?
पाप ग्रह राहु धन भाव में हो तो दो प्रकार कि स्थितियां बनती हैं। सकारात्मक स्थिति: शुभ ग्रहों से युक्त और दृष्ट होने पर शुभ फल मिले। मित्रों का सहयोग, बिजनेस, राइटिंग, एस्ट्रोलॉजी में निपुणता। नकारात्मक स्थिति: पाप व क्रूर ग्रहों के प्रभाव में व्यक्ति परिवारिक मतभेद से दुखी, रोगी, चिड़चिड़ेपन का शिकार होता है।
10 वां घर खाली हो तो क्या होगा?
दशम भाव से कर्म और करियर के बारे में विचार किया जाता है। अगर दशम भाव में कोई ग्रह स्थित नही है तो भाव का विश्लेषण भाव के स्वामी, कारक ग्रह, और कर्म भाव पर पड़ रही ग्रह दृष्टियों के अनुसार किया जाएगा।
कौन सा घर तलाक का प्रतिनिधित्व करता है?
विवाह और जीवनसाथी से जुड़े विषयों के शुभाशुभ फल के लिए सप्तम भाव प्रतिनिधित्व करता है। अगर सातवें घर में निर्बल शुक्र या भावेश हो, पाप ग्रहों से दृष्ट हो, तो विवाह विच्छेद की संभावना रहती है।
क्या 5 वें घर में राहु अच्छा है?
पंचम में राहु अगर शुभ ग्रहों के प्रभाव में है तो शुभ फल देगा। उत्तम संतान, कामयाबी, ऊंची शिक्षा। अगर राहु अशुभ ग्रहों के प्रभाव में है तो अशुभ फल देगा, जैसे की संतान संबंधित समस्या, पारिवारिक मतभेद।
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