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Kaal Sarp Dosh Puja: 1 आसान सम्पूर्ण मार्गदर्शिका, पूजा विधि

Last Updated on जून 11, 2025

भारतीय ज्योतिषशास्त्र, खासकर नवीनतम ज्योतिष विचारधारा के अनुसार जन्म कुंडली में घटित कालसर्प योग को एक महत्वपूर्ण कुंडली दोष माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ग्रहों की विचित्र स्थिति से बनने वाला यह दोष जातक के जीवन में अनेक प्रकार की बाधाओं, परेशानियों और विपदाओं का कारण बन सकता है। इस लिए ज्योतषविद सलाह देते हैं कि पता चलते ही जल्दी से जल्दी kaal sarp dosh puja करा लेनी चाहिए। जातक की कुंडली में यह दोष तब उत्पन्न होता है जब जन्म कुंडली में सभी सातों ग्रह- (सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, और शनि) राहु और केतु के मध्य स्थित होते हैं।  

आइए इस लेख के माध्यम से हम विस्तार से जानते हैं, kaal sarp dosh meaning, इसके लक्षण, संपूर्ण पूजा विधि, पूजा के लाभ, लागत (kaal sarp dosh puja cost), और उन सभी प्रमुख स्थलों के बारे में जहां पर इस पूजा को संपन्न किया जाता है और करना चाहिए, जैसे कि महाकाल की नगरी उज्जैन (kaal sarp dosh puja ujjain) और त्र्यंबकेश्वर मंदिर (kaal sarp dosh puja trimbakeshwar) इत्यादि।

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कालसर्प दोष का अर्थ और लक्षण  (kaal sarp dosh meaning)

कुंडली में कालसर्प दोष ग्रहों की एक ऐसी स्थिति से बनता है जिसमे सभी सातों ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) राहु और केतु के मध्य आ जाते हैं। यह ग्रह दोष व्यक्ति के जीवन में विभिन्न प्रकार की समस्याएं उत्पन्न कर सकता है, जैसे कि आर्थिक कठिनाइयाँ, वैवाहिक जीवन में तनाव, स्वास्थ्य समस्याएं, और करियर में रुकावटें इत्यादि।

कालसर्प दोष के लक्षण

  1. आर्थिक समस्याएं- जीवन में लगातार धन की कमी और वित्तीय अस्थिरता का बने रहना।
  2. स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां- शारीरिक तौर पर समस्याओं का बने रहना, जैसे कि बार-बार बीमार पड़ना या गंभीर बीमारियों का सामना करना इत्यादि। 
  3. वैवाहिक जीवन में तनाव- विवाह में देरी होना और वैवाहिक जीवन में असंतोष का बने रहना।
  4. करियर में रुकावटें- करियर, नौकरी और व्यवसाय में लगातार असफलताओं का सामना करना।
  5. मानसिक तनाव- जीवन में अवसाद, चिंता, का बने रहना और जातक में आत्मविश्वास की कमी इत्यादि।  

Kaal sarp dosh कैसे बनता है, इसके लक्षण, प्रकार, प्रभाव के बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारा ये लेख- (Kaalsarp Dosh: जानें कालसर्प दोष के लक्षण, भेद, प्रभाव, उपाय) पढ़ें। 

कालसर्प दोष पूजा से मिलने वाले लाभ (kaal sarp dosh puja benefits)

  • नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति- काल सर्प पूजा से जातक के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे इस दोष के नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। 
  • जीवन में आर्थिक समृद्धि- इस पूजा के उपरांत जातक के जीवन में वित्तीय समस्याओं में सुधार आता है और धन लाभ होने लग सकता है।
  • स्वास्थ्य में सुधार- इस दोष के कारणवश अगर जातक शारीरिक और मानसिक तौर पर अस्वस्थ हो, तो उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार देखने को मिलता है।  
  • वैवाहिक जीवन में सुख- अगर विवाह से संबंधित कोई प्रॉब्लम है, तो इस पूजा के उपरांत जातक के वैवाहिक जीवन में संतोष और सामंजस्य स्थापित होता है। 
  • करियर में सफलता- पूजा के उपरांत जातक को नौकरी या व्यवसाय में प्रगति और सफलता प्राप्त होने लगती है।

आवश्यक पूजन सामग्री (Kaal sarp dosh puja samagri list pdf)

🕉️ कालसर्प दोष पूजा सामग्री सूची 🕉️

1.
नाग-नागिन की 9 जोड़ी चांदी की मूर्ति
2.
एक काल सर्प यंत्र, एक छोटा सा शिवलिंग
3.
पंचामृत सामग्री (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
4.
बेलपत्र, धूप, दीप, अगरबत्ती
5.
काले तिल, काले उड़द
6.
कुशा घास (दूभ और दाभ)
7.
पांच प्रकार के फल
8.
100 ग्राम सुपारी
9.
10 ग्राम लोंग
10.
10 ग्राम इलायची
11.
1 छोटा पाउच रोली
12.
12 पान/पीपल/बरगद के पत्ते
13.
थोड़ा दूध, थोड़ी दही (अलग-अलग कटोरी में)
14.
एक मौली (कलवा)
15.
जनेऊ
16.
हवन सामग्री 500 ग्राम, एक गोला (नारियल का खोपरा)
17.
देसी घी एक किलोग्राम (हवन के लिए)
18.
थोड़ा शहद
19.
चीनी, बतासे
20.
पांच प्रकार की मिठाई
21.
एक दर्जन फूल माला
22.
पंचमेवा, पांच फल
23.
शुद्ध शहद 50 ग्राम
24.
250 ग्राम जौं
25.
100 ग्राम काले तिल
26.
100 ग्राम सफेद तिल
27.
500 ग्राम चावल (साबूत)
28.
100 ग्राम पीली सरसों
29.
100 ग्राम कमलगट्टे
30.
नवग्रह समिधा
31.
आम की लकड़ी (हवन हेतु)
32.
लोहे का कटोरा
33.
आम के पत्ते
34.
कपूर
35.
पीला या नीला कपड़ा (सवा मीटर)
36.
सूखा नारियल
37.
तिल का तेल
38.
कॉटन (रूई) और गूगुल

Simple Kaal sarp dosh puja step by step (शास्त्र अनुसार कालसर्प दोष पूजा की सरल विधि)

1. पूजा स्थान की तैयारी

जिस स्थान पर पूजा करनी है उस स्थान को गाय के गोबर से लीप लें। अगर यह मुमकिन ना हो तो उस स्थान को अच्छे से धोकर साफ सुथरा कर लें और उसे गंगाजल छिड़ककर पवित्र कर‌ लें। दिए गए चित्र अनुसार नाग मंडल वेदी का निर्माण कर ले और एक हवन की वेदी बना लें। अगर धातु का हवन कुंड उपलब्ध है तो उसे अपने पास रख ले। हवन सामग्री को तैयार कर लें। 

Kaal sarp dosh puja

नाग मंडल वेदी पर 9 स्थानों में प्रत्येक स्थान पर एक पान के पत्ते या बरगद या पीपल के पत्ते पर जल से भरी एक एक मिट्टी की कुल्हडी (घड़े का मिनी रूप) छोटे कलश के रूप में रखें, इनको कलावा बांधे और प्रत्येक कलश में नाग नागिन का जोड़ा, एक सुपारी, एक कमलगट्टा, एक हल्दी की गांठ, और चुटकी भर अक्षत डाल दें। प्रत्येक पत्ते पर भी एक बताशा, एक सुपारी, एक हल्दी की गांठ, एक पीला फूल और पास में एक फल रखें। 

चावल की पांच ढेरियां एक बड़ी थाली में बनाएं चार ढेरियों को मेहंदी, रोली, सिन्दूर, हल्दी से रंगे लें। टूटे हुए पीले फूलों के साथ फिर सभी रंग-बिरंगे चावलों को मिक्स कर लें, और यज‌मान के पास रख दें। पूजा स्थल के उत्तर-पूर्व दिशा में स्थान पर एक थाली में शिवलिंग को स्थापित करें। गेंदें के फूलों की माला और फूलों से सजाएं। 

यजमान तीर्थस्थान या पवित्र नदी (गोदावरी/गंगा) आदि में स्नान करें। अगर किसी मंदिर या अन्य पवित्र स्थान पर पूजा संपन्न की जा रही है तो स्नान के पानी में गंगाजल अवश्य मिला लें। स्नान के उपरांत यजमान स्वच्छ पितवर्ण या उजले वस्त्र धारण करें। 

पूजा स्थान के ईशान कोण में एक कलश को स्थापित करें और उसमें एक सुपारी, कमलगट्टा, बतासा, थोड़ी कुशा और दूभ डालें। आम के पत्तों को सुन्दर तरीके से लगाएं और आम के पत्तों पर एक बर्तन या दोनें में चावल डालकर कलश के उपर रखें और उस पर लाल कपड़े से लिपटे नारियल को रखें और नारियल के उपर एक दो फूल और फल रख दें। कलश को एक पीले फूलों की माला से सजां दें। पूजा में भाग लेने वाले ब्राह्मण और यजमान अपने आसान पर स्थान ग्रहण करें। यजमान पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे। पंडित जी उत्तराभिमुख होकर बैठे और पूजा प्रकरण शुरू करे।

2. पूजा आरम्भ (kaal sarp dosh puja)

अब पंडित जी पूजा प्रारंभ करें। कुशा से पवित्रीकरण करें, आचमन करें, प्राणायाम करें, पवित्री धारण इत्यादि सभी कर्मो के साथ कालसर्प दोष पूजा कर्म को आगे बढ़ाएं।

पवित्रीकरण:

ॐ अपवित्रः पवित्रोवासर्वावस्थांगतोऽपिवा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्ष सबाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।।

आचमनम्:

ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः।  अब नीचे दिए मंत्र से हाथ धुलवाएं-

ॐ हृषीकेशाय नमः।

प्राणायाम: 

ॐ भूः, ॐ भुवः, ॐ स्वः, ॐ महः, ॐ जनः, ॐ तपः, ॐ सत्यम्, ॐ तत्सवितुर्वरण्यं भर्गोदेवस्य धीमहिधियो यो नः प्रचोदयात्। आपोज्यतीरसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम्।

पवित्रीधारण मंत्र: 

तीन कुशा से बनी पवित्री बाएं हाथ की अनामिका में धारण करें, दो कुशा से बनी दाएं हाथ की अनामिका में धारण करें। अगर कुशा से बनी पवित्री ना हो तो सोने या चांदी की अंगूठी भी धारण कर सकते हैं- 

ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पनाम्य-छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनेतच्छकेयम्।। 

आसान शुद्ध करें: 

दाएं हाथ की अंजलि में जल लेकर अपने आसन के चारों ओर छिड़कें और मंत्र उच्चारण करें-  ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता । त्वं च धारय मां देवी पवित्रं करूचासनम्।।

रक्षासूत्र:

येनबद्धोबलीराजा दानवेन्द्रोमहाबलः तेनत्वामनुबध्नामि रक्षेत माचल माचल।

तिलक लगाएं: 

ॐ आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः। तिलकं तु प्रयच्छन्तु धर्मकामार्थ सिद्धये।।

स्वस्तिवाचन करें pdf: 

यजमान से संकल्प कराएं: 

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्री मद्भागवतो महापुरूषस्य, विष्णुराज्ञयाप्रवतमानस्य अधतस्यब्रम्हामणे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे भूलोकेजम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखंडे आर्यावर्तक देशान्तर्गते अमुक क्षेत्रे अंतर्गते अमुक स्थान अंतर्गते विक्रमी संवत ….., सक संवत…. , मासानाम मासो तमे मासे ….. मासे, ….. पक्षे, …… शुभ तिथि, ….. शुभ वासरे, मम अमुक नाम अमुक गोत्र उत्पन्नो: शर्मांहम् / वर्माहम् इत्यादि सत्प्रवृत्ति संवर्धनाय, दुष्ट प्रवृत्ति उन्मूलनाय, लोककल्याणाय , वातावरण परिष्कराय, उज्जवल भविष्य कामना पूर्ते च प्रबल पुरुषार्थ करिष्ये, अस्मये प्रयोजनाय कलशादि आवाहित देवता पूजन पूर्वकम्  कालसर्पदोष-निवारणार्थं विशेष पूजनं कर्म संपादनार्थ संकल्पं अहम करिष्ये।

गणेशाम्बिका पूजन (Ganesh Ambika Puja)

दाएं हाथ में अक्षत, पुष्प, ले लें और मंत्रोच्चार के बाद भगवान गणेश जी को अर्पित करें।

ॐ गणानान्त्वा गणपति गवंग हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियंपति गवंग हवामहे, निधीनान्त्वा निधिपति हवामहे, बसो मम। आहमजानि गर्भधमात्वमजासि गर्भधम्।।

हेरम्ब त्वमेहोहि ह्याम्बिकात्र्यम्बकात्मज, हे सिद्धिबुद्धिपते त्र्यक्ष लक्षलाभपितुः पितः।। नागास्यं नागहारं त्वां गणराजं चतुर्भुजम्। भूषितं स्वायुधैर्दिव्यैः पाशाङ्कुशपरश्वधैः।।२।। आवाहयामि पूजार्थ रक्षार्थंच मम क्रतोः। इहाउजगत्य गृहाण त्वंपूजां यागंचरक्ष मे।।३| वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

ॐ भूर्भुव: स्वः श्री गणपतये नमः गणपतिमावाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि, नमस्कार करोमि, अक्षतम्, पुष्पम्, दीपम्, धूपम्, नैवेद्यय्म् समर्पयामि:।

गणेश प्रतिमा या सुपारी गणेश जी पर, दुर्वा, फूल, लड्डू अर्पित करें।

दाएं हाथ में अक्षत पुष्प इत्यादि सामग्री लेकर मंत्र के बाद मां गौरी को अर्पित करें।

ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मा नयति कश्चन् । ससस्त्यश्श्वकः सुभद्रिकाङ्ग्राम्पीलवासिनीम् ।। हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शङ्करप्रियाम्। लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम् ।।

ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गौर्यै नमः, गौरीमावाहयामि स्थापयामि, …… नैवेद्यं समर्पयामि।

ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्ज्यस्य बृहस्प्पतिज्ञमिमं तनोत्वरिष्ट्रटं य्यज्ञगवंग समिमंदधातु । विश्श्वेदेवास ऽह मादयन्तामोंप्रतिष्ठ ।।अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तुअस्यैप्राणाः क्षरन्तु च। अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन।। श्री गणेशाऽम्बिके सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम् ।

यजमान अपने हाथ में पुष्प, अक्षत, अष्टगंध ले और मंत्र के बाद कलश पर अर्पित कर दें । मंत्र-
ॐ तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानों हविर्भि:। अहेडमानो वरुणे हबाध्युरुशं स मा न आयु: प्रमोक्षी:।। अस्मिन कलशे वरुणं सांङ्ग सपरिवारम् सायुधम् सशक्तिकमावाहयामि। ॐ भूर्भुवः स्वः भोवरुण इहागच्छ, इहतिष्ठ, स्थापयामि, पूजयामि, मम पूजाम् गृहाण। ॐ अपाम्पतयेवरुणाय नमः गंधअक्षतं पुष्पंदीपंधूपं नैवेद्यम् समर्मप्यामि: तत् नमस्कार करोमि।
अब कलश पर अक्षत-पुष्प इत्यादि छोड़ दें और हाथ जोड़कर कलश देवता को प्रणाम करें।

मातृका पूजन, नवग्रह पूजन (Matru & Navgrah Puja)

पुष्प, अक्षत दाएं हाथ में ले लें और मंत्र बोलने के उपरांत षोडश मातृका स्थान पर अर्पित कर दें।

गौरीपद्माशचीमेधा, सावित्रीविजयाजया। देवसेनास्वधा स्वाहा मातरोलोकमातरे। धृतिः पुष्टिस्तथातुष्टिरात्मनः कुलदेवता। गणेशेनाधिका ह्यता वृद्धौपूज्याश्च षोडशः मातृका।।

षोडश मातृकाभ्याम नमो नमः आवाहयामि, स्थाप्यामि, ध्यामि, ततो नमस्कार करोमि, गंधम्, अक्षतं, पुष्पं, दीपं, धूपं, नैवेद्यम् समर्पयामि। 

पुष्प इत्यादि सामग्री को अर्पित करें।

ॐ सूर्याय नमः, ॐ चन्द्राय नमः , ॐ मंगळाय नमः, ॐ बुधाय नमः, ॐ गुरुवे नमः, ॐ शुक्राय नमः, ॐ शनिश्चराय नमः, ॐ राहुवे नमः, ॐ केतुवे नमः, ॐ ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानु शशि भूमि सुतो बुधश्च, गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतवे, सर्वेग्रहा शान्ति करा भवन्तु। नवग्रह देवताभ्यो नमः। पुष्प इत्यादि सामग्री नवग्रह मंडल पर अर्पित करें।

अब राहु-केतु की विशेष पूजा करें। नीचे सभी प्रमुख मंत्र दिए गए हैं, श्रद्धा और विधिपूर्वक पूजा से राहु-केतु से संबंधित जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं।

Rahu and Ketu Shanti Mantra (राहु और केतु शांति मंत्र )- सोले हाथ में नीले रंग का फूल लें, अक्षत (चावल) लें, अन्य सामग्री भी ले लें और मंत्रो के उपरान्त राहु व केतु के स्थान पर अर्पित करें। 

अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिकागर्भ सम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्॥

पलाशपुष्पसङ्काशं तारकाग्रहमस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणम्यहम्॥

नमः राहवे च केतवे नमः शिरसि संस्थिते। ग्रहदोष विनाशाय कालसर्प निवारणम्॥ द्वादशार्के महाशक्ते ग्रहपीड़ा विनाशिनि। शत्रु बाधा हरे देव राहु केतु नमोऽस्तु ते॥

ॐ नमो अस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमन्थि। ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥

एक थाली में रखकर शिवलिंग पर पंचामृत से अभिषेक करें। नीचे रुद्राभिषेक के सम्पूर्ण मंत्र दिए हैं, पंडित और यजमान शुद्ध हृदय और श्रद्धा से रुद्राभिषेक करें। 

संपूर्ण रुद्राभिषेक मंत्र (सरल विधि के साथ)

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः……… प्रबल पुरुषार्थ करिष्ये, अस्मये प्रयोजनाय कलशादि आवाहित देवता पूजन पूर्वकम्, ॐ अस्य श्री रुद्राभिषेक पूजनस्य, श्री शिवप्रसाद सिद्ध्यर्थं, मम सर्वपापक्षयपूर्वक आयुः आरोग्य ऐश्वर्य प्राप्त्यर्थं, श्री शम्भोः प्रीत्यर्थं च रुद्राभिषेकं करिष्ये।

ध्यायामि शशिशेखरं त्रिनयनं, रक्ताम्बरं भस्मभूषितम्। नीलग्रीवं शूलपाणिं, वरदं शान्तमूर्तिम् उमापतिम्॥

ॐ नमः शिवाय, ॐ शिवाय नमः, ॐ हराय नमः, ॐ रुद्राय नमः, ॐ पशुपतये नमः, ॐ नीलकण्ठाय नमः, ॐ शम्भवे नमः, ॐ महेश्वराय नमः, ॐ सदाशिवाय नमः, ॐ ईशानाय नमः।

रुद्राभिषेक के लिए निम्नलिखित मंत्रोच्चार कीजिए (जल/पंचामृत आदि अर्पित करते समय):

शुद्ध 1.जल से स्नान कराएं और मंत्र बोलें

ॐ नमः शिवाय या ॐ रुद्राय नमः

इसी मंत्र के साथ 2. दूध, 3. शहद, 4. घृत, 5. दही, अंत में इत्र और गंगाजल से स्नान कराएं और बिल्वपत्र, धूप, दीप, नैवेद्य भगवान को शिव जी को अर्पित करें।

  • नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम।।
  • निराकारमोंकारमूलंतुरीयं गिराज्ञान गोतीतमीशंगिरीशम्। करालंमहाकाल कालंकृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम्।।
  • तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारुगंगा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा।।
  • चलत्कुण्डलं भूसुनेत्रंविशालं प्रसन्नाननंनीलकण्ठं दयालम्। मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालंपरियंशकरं सर्वनाथं भजामि।।
  • प्रचण्ड प्रकृष्टं प्रगलेभम् परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्। त्र्यशूलनिर्मूलनं शूलपाणि भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्।।
  • कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी सदा सचिदानन्ददाता पुरारी चिदानन्दसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।
  • न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजंतीह लोके परे वा नराणाम्। न तावद् सुखं शान्ति सन्ताप नाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥
  • न जानामियोगंजपंनैवपूजां नतोहंसदासर्वदा शम्भुतुभ्यम् । जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानंप्रभोपाहि आपन्नमामीश शंभो

॥ इतश्री रुद्राषटकं संपूर्णम ॥

शिव पंचाक्षरी मंत्र जप: ॐ नमः शिवाय (कम से कम 108 बार रुद्राक्ष माला से इस मंत्र को जपें)

ॐ त्र्यंबकं यजामहेसुगन्धिंपुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात्॥ ( इस मंत्र का जाप कम से कम 11 बार करें)

कालसर्प दोष की मुख्य पूजा (Main Kaal Sarp Dosh Puja)

स्थापित किए गए कालसर्प यंत्र, नाग-नागिन की मूर्ति या चित्र से विशेष कालसर्प पूजा आरम्भ करें।

दाएं हाथ में अक्षत पुष्प इत्यादि सामग्री ले लें पंडित मंत्र बोले-  ॐ नमो अस्तु सर्पेभ्यः ये के च पृथिव्याम् ये अंतरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः आवायामि स्थाप्यामि, ध्यायामि, नमस्कार करोमि, पुष्पं, अक्षतं, दीपं, धूपं, नैवेद्यं समर्पयामि। पुष्पादि सामग्री कालसर्प यंत्र पर अर्पित करें।

ॐ नमः भुजंगाय आयुष्यम् सौभाग्यम् धनं देहि मे सर्वदोष विनाशाय कालसर्प शांति कुरु कुरु।। 

अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्। शङ्खपालं धृतराष्ट्र तक्षकं कालियं तथा।। एतानि नवनामानि नागानां च महात्मनाम्। सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः।। तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

॥ इति श्री नवनाग नाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम्॥

अनन्तो नाग-राजेन्द्र आदित्याराधनेरतः। महापाप-विषंहित्वा शांतिमाशु करोतु ते।। अतिपीतेन देहेन विस्फुरद् भोग सम्पदा। 

तेजसा चातिदीप्तेन कृत स्वस्तिक लाञ्छनः।। नागराट् तक्षकः श्रीमान् नागकोट्या समन्वितः। करोतु ते महाशांतिं सर्वदोष विषापहम्।। अतिकृष्णेन वर्णेन स्फुरिताधिक-मस्तकः। कण्ठरेखात्रयोपेतो घोरदंष्ट्रायुधोद्यतः।।

कर्कोटको महानागो विषदर्प-बलान्वितः । विष-शस्त्राग्नि-संतापं हत्वा शांतिं करोतु ते।। पद्मवर्णः पद्म कान्तिः फुल्ल पद्मायतेक्षणः। ख्यातः पद्मो महानागो नित्यं भास्करपूजकः।।

स ते शांतिं शुभं शीघ्रमचलं सम्प्रयच्छतु। श्यामेन देहभारेण श्रीमत्कमल लोचनः। विषदर्प-बलोन्मत्तो ग्रीवायां रेखयान्वितः।‌। शंखपालश्रिया दीप्तः सूर्यपादाब्जपूजकः। महाविषं गरश्रेष्ठं हत्वा शांतिं करोतु ते।। अतिगौरेण देहेन चन्द्रार्थ कृत शेखरः। 

दीपभागे कृता टोप शुभलक्षण लक्षितः।। कुलिको नाम नागेन्द्रो नित्यं सूर्यपरायणः। अपहृत्य विषं घोरं करोतु तव शांतिकम्।। अंतरिक्षे च ये नागा ये नागास्वर्गसंस्थिताः। गिरिकन्दरदुर्गेषु ये नागा भुवि संस्थिताः।।  पाताले ये स्थिता नागा: सर्वे यत्र समाहिताः। सूर्यपादार्चने सक्ताः शांतिं कुर्वन्तु ते सदा।। नागिन्यो नाग कन्याश्च तथा नागकुमारकाः। सूर्यभक्ताः सुमनसः शांतिं कुर्वन्तु ते सदा।। य इदं नागसंस्थानं कीर्तयेच्छृणुयात् तथा। न तं सर्पा विहिंसन्ति न विषं क्रमते सदा।। (भविष्य पुराण ब्राह्मपर्व)

पिंड दान एवं तर्पण (Pitra Shanti – Optional but Recommended)

अगर जातक पर कालसर्प दोष के साथ साथ पितृ दोष भी हो तो इस कर्म को जरूर करें। अगर पितृ दोष नही हो केवल कालसर्प दोष ही हो तो इस कर्म क्रिया को छोड़ भी सकते हैं। इस क्रम को मैं यहां पर बस सांकेतिक रूप में दे रहा हूं। 

संपूर्ण पिंडदान और तर्पण विधि के लिए पढ़ें (पितृपक्ष श्राद्ध विधि)

नीचे दिए गए मंत्रों से सूक्ष्म रूप में पिंडदानकर सकते हैं।   

ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।  ॐ नमः सर्वपितृ देवताभ्यः। 

क्रिया: तिल, जल, पुष्प आदि से पिंड दान करें।

सरल कालसर्प दोष निवारण हवन / अग्निहोत्र (Saral Havan Vidhi)

हवन सामग्री में काले तिल, घी, चंदन, नागद्रव्य, गुग्गुल इत्यादि को अच्छे से मिक्स करके तैयार कर लें। नवग्रहो की समिधाएं व आम की सूखी लकड़ियां पास में रख लें। घी को गर्म कर लें। रेत पर बेदी बनाएं या बना बनाया हवन कुंड ले लें। बेदी या हवन कुंड की चारों दिशाओं में चार-चार कुशा रखें। कुंड में चार-चार अंगुल की उत्तर दक्षिण तीन रेखा खींच लें। तीनों रेखाओं से अनामिका और अंगूठे से थोड़ी-थोड़ी मिट्टी उठाकर बाहर फेंक दें। ॐ का उच्चारण करके जल का एक छींटा वेदी या हवनकुंड पर छिड़क दें। अग्नि मंगा लें। 

Havan

अग्नि का पूजन करके अग्नि जला दें और उस पर कुछ लकड़ियां लगा दें और हवन कुंड की उत्तर दिशा में परिणीता पात्र और प्रोक्षणी पात्र दोनों रख दें और पानी से भरे हुए इन पात्रों में तीन-तीन कुशा रख दें। वहीं पास में घी का पात्र भी रखें और तीन लकड़ियों को घी में डुबोकर रख लें।

प्रणीता पात्र का जल प्रोक्षणी पात्र में और प्रोक्षणी पात्र का प्रणीता पात्र में मिलाकर बेदी के चारों तरफ की धार बांधे और कुछ जल को प्रणिता पात्र डाल कर यजमान के पास रख दें। अब ब्राह्मण हवन कुंड की अग्नि को प्रज्वलित करें और हवन आरंभ करें सबसे पहले तीन लकड़ियों की आहुति देनी है और सुरवे में बचा हुआ घी प्रत्येक आहुति के बाद प्रणिता पात्र में छोड़ देना है।

मंत्र उच्चरित करते हुए अग्नि जला लें। 

ॐ अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे । देवाँ  देवाँ आ सादयादिह।।

ॐ सर्वतः पाणिपादश्च सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः। विश्वरूपो महानग्निः प्रणीतः सर्वकर्मसु। अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम्। सुवर्णवर्णममलं समिद्धं सर्वतोमुखम् ॥

घी में टच की गई तीन लकड़ियों की आहुति 

ॐ अयन्त इम आत्मा जात वेद स्तेन ध्यश्व वर्धस्व चेद् वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिः ब्रह्मवर्च सेना नाद्यो न समेधय स्वाहा। इदं न मम।

ॐ सु समिधाय शोचिषे घृत तानं जुहोतन। अग्नये जात वेद से स्वाहा। इदं न मम।

ॐ तत्वा समिदभि अंगिरो घृतेन वर्धयामसि। वृहद्दोच्चाय विष्ठय स्वाहा। इदं न मम।

ॐ अग्नये स्वाहा इदं अग्नये न मम । ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय न मम। ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये न मम । ॐ भू र्भुव स्वारादित्याय स्वाहा न मम। ॐ इन्द्राय स्वाहा इदं इन्द्राय न मम । ॐ भूः स्वाहा इदं अग्नये न मम। ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे न मम । ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय न मम। ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जन ॐ तपः ॐ सत्यं, सप्त लोकेभ्यः स्वाहा।

नौ ग्रहों की समीधा

आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्न मृतं मर्यच । हिरण्येन सविता र्थेन देवो याति भुवनानि पश्यन्न स्वाहा – इदं सूर्याय न मम।

इम्मं देवा असपत्न सुयुध्वं महते क्षत्राय महते ज्येष्ठाय महते जान राज्या येन्द्रिस्येन्द्रियाय इम ममुष्य पुत्र मुस्यै विश एष वोऽ मी राजा सोमो अस्माकं ब्राह्मणाना ॐ राजा चन्द्रमसे स्वाहा – इदं चन्द्रमसे न मम।

ॐ अग्नि मूर्द्धा दिवः ककुत्यति पृथिव्यां अयम अपा गवंग रेता गवंग सिजिनवति स्वाहाः इदं नम मम।

ॐ उद्बुध्य स्वाग्ने प्रतिजागृहित्व मिष्ठा पूर्ते स गवंग सृजेथा मयंच । अस्मिन् स धस्थे अध्यु तरस्मीन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत बुधाय स्वाहा। इदं न मम

ॐ वृहस्पते अति य दर्यो अर्हाद्यु मद्वि भाति क्रतु मज्जनेषु यदीदयच्छवस ऋत प्रजा तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रं  स्वाहा – इदं वृहस्पतये न मम।  

ॐ अन्नात् परिश्रुतो रस ब्राह्मण व्यपिवत क्षत्रम्पयः सोमं प्रजापतिः । ऋतेन सत्य मिन्द्रियं विपान ग्वंग शुक्र मंधस इन्द्रस्येन्द्रिय मिदं पयो ऽ मृत मधु स्वाहा। इदं शुक्राय न मम। 

ॐ शन्नो देवी रभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंभोरभि स्रवन्तु नः स्वाहा। शनये न मम।

कया नश्चित्र आभव दूती सदा वृधः सखा। कया शचिष्टयावृता स्वाहा। राहवे इदं न मम।

ॐ केतुं कृणवन्न केतवे पेशो मर्या अपेश से । समुषद्भिर जायथा स्वाहा। केतवे इदं न मम।

108 देव मंत्र आहूति 

ॐ गंगणपते स्वाहा। ॐ वनऋतयेस्वाहा। ॐ वायवेस्वाहा। ॐ अध्वरायस्वाहा। ॐ ईशानायस्वाहा। ॐ अजाय स्वाहा। ॐ नलायस्वाहा। ॐ प्रभासायस्वाहा। ॐ एकपदे स्वाहा।ॐ रवताय स्वाहा। ॐ प्रजापते स्वाहा। ॐ सोमाय स्वाहा। ॐ ब्रह्मणेस्वाहा। ॐ आग्नेयस्वाहा। ॐ दुर्गायै स्वाहा। ॐ यमाय स्वाहा। ॐ वरुणाय स्वाहा। ॐ इंद्राय स्वाहा। ॐ ध्रुवाय स्वाहा। ॐ अवनलाय स्वाहा। ॐ प्रत्युषाय स्वाहा। ॐ अदभ्य:स्वाहा। ॐ अवहाबुध्न्याय स्वाहा। ॐ रैवताय स्वाहा। ॐ सपाय स्वाहा। ॐ बहुरूपाय स्वाहा। ॐ सववत्रे स्वाहा। ॐ ववरूपाक्षाय स्वाहा।

ॐ वपनावकनेस्वाहा। ॐ धात्रेस्वाहा। ॐ यमायस्वाहा। ॐ सूर्यायस्वाहा। ॐ वववस्वतेस्वाहा। ॐ सववत्रेस्वाहा। ॐ ववष्णवेस्वाहा। ॐ क्रतवेस्वाहा। ॐ वसवेस्वाहा। ॐ कामायस्वाहा। ॐ रोचनायस्वाहा। ॐ आद्रावाय स्वाहा। ॐ अविष्ठाताय स्वाहा। ॐ त्रयंबकाय भूरेश्वराय स्वाहा। ॐ जयंताय स्वाहा। ॐ रुद्राय स्वाहा। ॐ वमत्राय स्वाहा। ॐ वरुणाय स्वाहा। ॐ भगाय स्वाहा। ॐ पूष्णे स्वाहा। ॐ त्वषटे स्वाहा। ॐ अवशवभ्यं स्वाहा। ॐ दक्षाय स्वाहा। ॐ फालाय स्वाहा। ॐ अध्वराय स्वाहा। ॐ वपशाचेभ्या: स्वाहा। ॐ पुरूरवसे स्वाहा। ॐ वसद्धेभ्य: स्वाहा। ॐ सोमपाय स्वाहा। ॐ सपेभ्या स्वाहा।

ॐ ववहाषदे स्वाहा। ॐ अनन्तायस्वाहा। ॐ भारद्वाजाय स्वाहा। ॐ वसुकयेस्वाहा। ॐ तक्षकायस्वाहा। ॐ गौतमायस्वाहा। ॐ गन्धवााय स्वाहा। ॐ सुकालाय स्वाहा। ॐ हुह्वै स्वाहा। ॐ शुद्राय स्वाहा। ॐ एक श्रृंगाय स्वाहा। ॐ कश्यपाय स्वाहा। ॐ सोमाय स्वाहा। ॐ अत्रयेस्वाहा। ॐ जमदियेस्वाहा। ॐ शेषायस्वाहा। ॐ पदमायस्वाहा। ॐ कर्कोटकायस्वाहा। ॐ शंखपालायस्वाहा। ॐ कं बलाय स्वाहा। ॐ वभ्य: स्वाहा। ॐ गुह्यकेभ्य: स्वाहा। ॐ अदभ्य: स्वाहा। ॐ भूतेभ्या स्वाहा। ॐ मारुताय स्वाहा। ॐ ववश्वावमत्रायस्वाहा। ॐ ववश्वावसवे स्वाहा। ॐ जगत्प्राणाय स्वाहा। ॐ हयायै स्वाहा। ॐ मातररश्वने स्वाहा। ॐ धृताच्यै स्वाहा। ॐ गंगायै स्वाहा। ॐ मेनकायै स्वाहा। ॐ सरय्यवै स्वाहा। ॐ ववशष्ठायस्वाहा। ॐ उवास्यै स्वाहा। ॐ रंभायै स्वाहा। ॐ महापदमाय स्वाहा।

ॐ सुकेस्यै स्वाहा। ॐ वपतृभ्या स्वाहा। ॐ वतलोत्तमायै स्वाहा। ॐ रुद्रेभ्य: स्वाहा। ॐ मंजुघोषाय स्वाहा। ॐ नन्दीश्वराय स्वाहा। ॐ स्कन्दाय स्वाहा। ॐ महादेवाय स्वाहा। ॐ भूलायै स्वाहा। ॐ मरुदगणाय स्वाहा। ॐ वश्ये स्वाहा। ॐ मृत्यवे स्वाह। ॐ दवध समुद्राय स्वाहा। ॐ ववघ्नराजाय स्वाहा। ॐ सोमाय स्वाहा। ॐ बुधाय स्वाहा। ॐ समीरणाय स्वाहा। ॐ शनैश्चराय स्वाहा। ॐ मेवदन्यै स्वाहा। ॐ के तवे स्वाहा। ॐ सरस्वतयै स्वाहा। ॐ महेश्वया स्वाहा। ॐ कौवशक्यै स्वाहा। ॐ वैष्णव्यै स्वाहा। ॐ वैत्रवत्यै स्वाहा। ॐ इन्द्राण्यै स्वाहा। ॐ ताप्तये स्वाहा। ॐ गोदावये स्वाहा। ॐ कृष्णाय स्वाहा। ॐ रोगाय स्वाहा। ॐ समीराय स्वाहा। ॐ मरुते स्वाहा। ॐ जीवन समुद्राय स्वाहा।

ॐ रेवायै पयौ दायै स्वाहा। ॐ तुंगभद्रायै स्वाहा। ॐ भीमरथ्यै स्वाहा। ॐ लवण समुद्राय स्वाहा। ॐ क्षुद्रनदीभ्या स्वाहा। ॐ सुरा समुद्राय स्वाहा। ॐ इक्षु समुद्राय स्वाहा। ॐ सवपा समुद्राय स्वाहा। ॐ वज्राय स्वाहा। ॐ क्षीर समुद्राय स्वाहा। ॐ दण्डाये स्वाहा। ॐ आवदत्याय स्वाहा। ॐ पाशाय स्वाहा। ॐ भौमाय स्वाहा। ॐ गदायै स्वाहा। ॐ पदमाय स्वाहा। ॐ बृहस्पतये स्वाहा। ॐ महाववष्णवे स्वाहा। ॐ राहवे स्वाहा। ॐ शक्त्ये स्वाहा। ॐ ब्रह्मयै स्वाहा। ॐ खंगाय स्वाहा। ॐ कौमाये स्वाहा। ॐ अंकुशाय स्वाहा। ॐ वाराहै स्वाहा। ॐ वत्रशूलाय स्वाहा। ॐ चामुण्डायै स्वाहा। ॐ महाववष्णवे स्वाहा।

अथ नागमण्डल देवताहोम

 ॐ जगद् गौर्ये स्वाहा। ॐ सिद्धयोगिन्यै स्वाहा।ॐ नागपत्नीभ्यो स्वाहा। ॐ शैव्यै स्वाहा। ॐ नागेश्वर्यै स्वाहा। ॐ मनसादेव्यै स्वाहा। ॐ वैष्णव्यै स्वाहा। ॐ नागभगिन्यै स्वाहा। ॐ जरत्कारुप्रियायै स्वाहा। ॐ विषहारिण्यै स्वाहा। ॐ विषरूपिण्यै स्वाहा। ॐ कालाय स्वाहा। ॐ केतवे स्वाहा। ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ जरत्कारवे स्वाहा। ॐ परशुरामाय स्वाहा। ॐ भृग्वे स्वाहा। ॐ हनुमते स्वाहा। ॐ अष्टवसुभ्यो स्वाहा। ॐ भूतनागेभ्यो स्वाहा। ॐ जनमेजयाय स्वाहा। ॐ अंड्राय स्वाहा। ॐ कुलीराय स्वाहा। ॐ सर्पपुङ्गवाय स्वाहा। ॐ ऐरावताय स्वाहा। ॐ कम्बलाय स्वाहा। ॐ पद्माय स्वाहा। ॐ शेषाय स्वाहा। ॐ महाशंखाय स्वाहा। ॐ धृतराष्ट्राय स्वाहा।

ॐ देवदत्ताय स्वाहा। ॐ नागेश्वर्यै स्वाहा। ॐ आस्तीकमात्रे स्वाहा। ॐ अमृतरक्षिण्यै स्वाहा। ॐ राहवे स्वाहा। ॐ सर्पाय स्वाहा। ॐ चित्रगुप्ताय स्वाहा। ॐ आस्तीकमुनये स्वाहा। ॐ श्रृंगि ऋषये स्वाहा। ॐ दुर्वाससे स्वाहा। ॐ सप्तर्षिभ्यो स्वाहा। ॐ भैरवाय स्वाहा। ॐ मृत्युरोगाभ्यां स्वाहा। ॐ मृत्युरोगाभ्यां स्वाहा। ॐ वैन्याय स्वाहा। ॐ कार्त्तवीर्यार्जुनाय स्वाहा। ॐ कङ्कनीराय स्वाहा। ॐ एलापत्राय स्वाहा। ॐ धनञ्जयाय स्वाहा। ॐ अश्वतराय स्वाहा। ॐ पद्मनाभाय स्वाहा। ॐ शंखाय स्वाहा। ॐ श्वेताय स्वाहा। ॐ शंखचूडाय स्वाहा। ॐ कुहकाय स्वाहा। ॐ सर्व राशि नक्षत्राय स्वाहा। ॐ घृत मातृकाय स्वाहा। ॐ षोडश मातृकाय स्वाहा। ॐ सर्व दिग्पालेभ्यो स्वाहा। 

ॐ नमः नागाय कालसर्पदोष विनाशाय इदं हव्यं गृहाण स्वाहा। (यह मंत्र 108 बार या 21 बार जपें)

गोले की आहुति 

ॐ मूर्द्धानं दिवो अरतिं पृथिव्यां वैश्वानरमृतं मा जाति मग्निम् । कवि ग्वंग साम्राज्य अतिथि जनाना मासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः। पूर्णादर्वि परापत सुपूर्णा पुन रापत वसनेव विक्रीणा वहा इषमूजं शतक्रतो स्वाहा। इदं अग्नये न मम। 

तीन पूर्ण आहुति 

वसुधारा – ॐ वसोः पवित्र मसि शत धारं बसो पवित्र मसि सहस्र धारम् देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शत धारेण सुप्वा काम धुक्षः स्वाहा। 3 

3 प्रमुख देवताओं (गणेश जी, शिवजी और काल सर्प) की आरती करें।

प्रदक्षिणा

एक स्थान पर खड़े होकर क्लोक वाइज सात चक्कर पूरें करें। मंत्र बोलें- यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च तानि तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे।

क्षमा याचना

ॐ आवाहनं न जानामि, नैव जानामि पूजनम्, विसर्जनं न जानामि, क्षमस्व परमेश्वर।  मंत्रहीनं क्रियाहीनं, भक्तिहीनं सुरेश्वर, यत्पूजितं मया देव, परिपूर्णं तदस्तुमे भगवन।।

भस्म लेपन

सभी जान को पंडित हवं की भसम का तिलक लगाए। 

हवन पूजा समाप्ति मंत्र और कर्म

ॐ पूर्णमदः पूर्णमस्य पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुदुच्यते । पूर्ण मादाय पूर्णमेवाव शिष्यते।।

हवन में नैवेद्य अर्पित करें भोग लगाएं और हरि ओम् शान्ति – हरि ओम् शान्ति कहें।

पुजारी यजमान को आशीर्वाद और प्रसाद प्रदान करे। हवन पूर्ण हुआ।

प्रमुख कालसर्प दोष पूजा के प्रमुख स्थल (best place for kaal sarp dosh puja)

1. त्र्यंबकेश्वर महाराष्ट्र (kaal sarp dosh puja trimbakeshwar)

त्र्यंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नासिक जिले के त्रयंम्बक शहर में गोदावरी नदी के पास ब्रह्मगिरि पर्वत की छाया में स्थित है।  यह भगवान शिव शंकर जी के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एकमहत्पूर्ण ज्योतिर्लिंग है। यह शिवालय kaal sarp dosh puja के लिए बहुत महत्व रखता है। पुरे भारतवर्ष में इस पूजा के लिए बहुत प्रसिद्ध है।

यहां पूजा पाठ की लागत पूजन के रूप और पंडितों के अनुभव पर निर्भर करती है। फिर भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूजा का खर्च लगभग ₹3100 से ₹31000 तक हो सकता है। कंई बार कुछ विशेष पूजा विधियों में kaal sarp puja in trimbakeshwar cost ₹31000 से अधिक भी हो जा सकती है। यह मुख्यतः पूजा के आकार प्रकार पर निर्भर करता है।

2. उज्जैन महाकालेश्वर, मध्य प्रदेश (kaal sarp dosh puja ujjain)

Kaal sarp dosh puja mahakaleshwar mandir

मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर kaal sarp dosh puja के लिए एक प्रमुख शिवाला है। यहाँ काल सर्प दोष पूजा की लागत (kaal sarp puja cost in ujjain) ₹3100 से ₹31000 तक हो सकती है। उज्जैन नगरी के इस मंदिर में kaal sarp dosh puja in hindi विशेष विधि से पूजा कराई जाती है, जो सभी श्रद्धालुओं खासकर कालसर्प दोष से पीड़ित को विशेष संतुष्टि देती है।

इनके आलावा गुजरात के सोमनाथ मंदिर में भी काल सर्प दोष पूजा की जाती है। अगर इस प्रकार के स्थानों पर जाकर पूजा सम्भव न हो तो आप अपने गाँव या शहर के किसी शिवाले में पूजा संम्पन कर सकते हैं। आप चाहें तो अपने घर के पूजा स्थल पर या पुजारी द्वारा सुझाये पवित्र स्थान पर भी यह पूजा कर सकते हैं।

घर पर कालसर्प दोष पूजा कैसे करें? (kaal sarp dosh puja at home)

कई बार हमसे लोग पूछते हैं कि क्या यह पूजा घर पर या अपने आसपास के मंदिरों में की जा सकती है तो हां यह संभव है। यदि आप चाहें तो अपने आसपास के मंदिरों में पूजा कर सकते हैं अगर मंदिर में पूजा ना करके घर पर करना चाहे तो यह भी संभव है वास्तव में पूजा का स्थान यह मायने रखता है कि वह पवित्र हो। तो kaal sarp dosh puja at home भी कर सकते हैं। इसके लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं तो पूजा का पूरा फल मिलता है। उपर लेख में सम्पूर्ण सरल पूजा विधि बताई गई है। 

कालसर्प दोष पूजा की लागत (kaal sarp dosh puja cost)

इस पूजा की लागत मुख्य रूप से मुख्य रूप से स्थान, पंडितों की संख्या, और पूजा के आकार और प्रकार पर निर्भर करती है। सामान्यतः, पूजा की लागत ₹3100 से ₹51000 तक हो सकती है। इसके अलावा कुछ स्थानों पर कालसर्प दोष की विशेष पूजा के लिए लागत ₹51000 से उपर जा सकती है। सच कहूं तो पूजा की लागत पूजा की स्थिति पर निर्भर करती है।

kaal sarp dosh ke upay and Nivaran | कालसर्प दोष के उपाय और निवारण

कालसर्प दोष के कारण, प्रकार, लक्षण, kaal sarp yog remedies उपाय इत्यादि को समझने और जानने के लिए हमारा आर्टिकल (Kaalsarp Dosh: जानें कालसर्प दोष के लक्षण, भेद, प्रभाव, उपाय!) पढ़ें। 

निष्कर्ष

Kaal sarp dosh puja कर्मकाण्ड, एक बहुत ही महत्वपूर्ण ज्योतिषीय, धार्मिक और आध्यात्मिक उपाय है, जो दोष से पीड़ित व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि और सफलता ले कर आता है। चाहे आप इस पवित्र कर्मकांड को घर पर करें (kaal sarp dosh puja at home) या उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर (kaal sarp dosh puja ujjain, kaal sarp dosh puja trimbakeshwar) जैसे तीर्थ स्थलों पर, यह पूजा आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का काम करती है।

यदि आप kaal sarp dosh ke upay खोज रहे हैं, तो ऊपर बताए गए उपाय व पूजा विधियाँ आपको अवश्य लाभ देंगी। ध्यान रहे, किसी योग्य पंडित या ज्योतिषाचार्य से सलाह लेकर ही पूजा करें, विशेषकर जब आप kaal sarp puja in trimbakeshwar या अन्य किसी विशेष स्थान पर जाकर पूजा के लिए योजना बना रहे हों।

FAQ:

काल सर्प दोष पूजा कैसे की जाती है?

काल सर्प दोष पूजा में विधि विधान पूर्वक सम्पूर्ण पूजा सामग्री के साथे भगवान शिव, राहु केतु और नाग देवताओं की पूजा की जाती है और हवन किया जाता है।

क्या मैं काला सर्प दोष वाली लड़की से शादी कर सकता हूं?

आप निःसंकोच काल सर्प दोष वाली लड़की या लड़के से शादी कर सकते हैं। अगर किसी प्रकार का संदेह होता है तो कुंडली मिलवा कर देख लेनी चाहिए और काल सर्प दोष के उपाय कर लेने चाहिए।

How much does Kaal Sarp pooja cost?

Kaal Sarp Dosh puja cost totally depends on the Puja location, Pandit’s experience, size of Puja, Most of the time cost is Rs. 2100 to Rs.31000.

स्रोत:  Books- कर्मकाण्ड भास्कर, काल सर्प शांति पद्धति, सर्वदेव पूजा पद्धति, मुहर्तमार्तण्ड, श्रीमद्भागवत पुराण, मैत्रायणी संहिता, Hindi Writing google input Tool 

डिसक्लेमरः यह लेख किसी भी जानकारी, सामग्री, गणितीय सिद्धांत की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी बिल्कुल भी नहीं है। भिन्न-भिन्न वास्तु विशेषज्ञों , कर्मकाण्ड सम्बंधित पुस्तकों, वेदों, पुराणों, पंचांगों, सत्संगों, सामाजिक मान्यताओं, दन्त कथाओं, लोक कथाओं ,धार्मिक ग्रंथों, इत्यादि सांस्कृतिक विरासत से संग्रहित करने के बाद यह कंटेंट आप तक पहुंचाया गया है।

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मनोज आचार्य जी एक ज्योतिषी और कन्टेंट राइटर हैं। इन्होंने Master of Art in Jyotish Shastra and Master of Art in Mass communication की डिग्री प्राप्त की है और दोनों क्षेत्रों में व्यापक ज्ञान और अनुभव रखते हैं। आचार्य जी ज्योतिष शास्त्र के क्षेत्र में लगभग 10 वर्षों का अनुभव रखते हैं। हजारों कुंडलियों के विश्लेषणात्मक अध्ययन और अपने समर्पण और कड़ी मेहनत के द्वारा गहन विशेषज्ञता हासिल की है। इसके अलावा आचार्य जी अन्य विषयों जैसे कि पत्रकारिता, ट्रेवल, आयुर्वेद, अध्यात्म, सामाजिक मुद्दों, हेल्थ आदि पर भी अपने विचार लेखों के माध्यम से साझा करते रहते हैं।

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