Navratri 2026: नवदुर्गा पूजा, व्रत विधि, नौ देवियों की कथा
Last Updated on मार्च 19, 2026
Published: 10 सितम्बर, 2024 by पंडित मनोज आचार्य
Navratri हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख त्योहारों में गिना जाता है। यह पर्व देवी मां दुर्गा और उनके नौ अवतारों की पूजा आराधना के लिए मनाया जाता है और माता के भक्त नौ दिनों तक देवी के नौ रूपों की विशेष पूजा और उपासना करते हैं। श्रद्धालु जन इन पवित्र नौ दिनों मे उपवास भी रखते हैं।
नवरात्रि के दौरान प्रत्येक दिन देवी के एक विशेष रूप की पूजा होती है, और हर देवी का अपना एक अलग धार्मिक और सांकेतिक महत्व होता है। मां दुर्गा का प्रत्येक रूप हम सभी को कोई न कोई संदेश और सीख देता है।
इस महत्वपूर्ण लेख में हम अध्यात्मिकता को समर्पित पवित्र नौ दिनों के दौरान पूजनीय नौ देवियों की पूजा-अर्चना और उपवास विधि की विस्तृत जानकारी देंगे और उनके साथ जुड़ी सभी कथाओं और धार्मिक महत्व को भी जानेंगे।
Chaitra Navratri- 19 मार्च 2026 से आरम्भ होंगे और समापन और कंचका पूजा 27 मार्च 2026 को होगा। शारदीय नवरात्रि- 11 अक्टूबर 2026को आरम्भ होकर 20 अक्टूबर 2026 को समाप्त होंगे। नवरात्रि व्रत से संबंधित कैलेंडर संपूर्ण जानकारी के साथ नीचे दिया गया है। नवरात्र के दौरान नौ दिनों तक माता दुर्गा की उपासना और दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जायेगा। और भक्तगण अपने घरों में पूजा करेंगे।
नवरात्रि के नौ दिन का संयुक्त त्योहार, देवी दुर्गा के नौ अवतारों की उपासना और आराधना के लिए संपूर्ण हिन्दू समाज में व्यापक रूप से मनाया जाने वाला सबसे लोकप्रिय उत्सव है। नवरात्रि प्रत्येक वर्ष में दो बार आती है, चैत्र मास में और अश्विन मास में। दोनों नवरात्र पर्वों की संपूर्ण जानकारी पूजा पाठ के साथ नीचे दी गई है।
🌺 नवरात्रि कैलेंडर 2026 🌺
चैत्र नवरात्रि (मार्च 2026)
पहला दिन
19 मार्च 2026, गुरुवार (प्रतिपदा) घटस्थापना मुहूर्त: 06:52 – 07:43
शैलपुत्री माता की पूजा
शुभ रंग: पीला
दूसरा दिन
20 मार्च 2026, शुक्रवार (द्वितीया)
ब्रह्मचारिणी माता की पूजा
शुभ रंग: हरा
तीसरा दिन
21 मार्च 2026, शनिवार (तृतीया)
चंद्रघंटा माता की पूजा
शुभ रंग: ग्रे
चौथा दिन
22 मार्च 2026, रविवार (चतुर्थी)
कुष्मांडा माता की पूजा
शुभ रंग: नारंगी
पाँचवा दिन
23 मार्च 2026, सोमवार (पंचमी)
स्कंदमाता की पूजा
शुभ रंग: सफेद
छठा दिन
24 मार्च 2026, मंगलवार (षष्ठी)
कात्यायनी माता की पूजा
शुभ रंग: लाल
सातवां दिन
25 मार्च 2026, बुधवार (सप्तमी)
कालरात्रि माता की पूजा
शुभ रंग: गहरा नीला
आठवां दिन
26 मार्च 2026, बृहस्पतिवार (अष्टमी)
महागौरी माता पूजा
शुभ रंग: गुलाबी
नौंवा दिन
27 मार्च 2026, शुक्रवार
सिद्धिदात्रि माता पूजा
नवरात्रि पारण व समापन
शुभ रंग: बैंगनी
शारदीय नवरात्रि (अक्टूबर 2026)
पहला दिन
11 अक्टूबर 2026, रविवार (प्रतिपदा) घटस्थापना मुहूर्त: 06:19 – 10:12
शैलपुत्री माता पूजा
शुभ रंग: नारंगी
दूसरा दिन
12 अक्टूबर 2026, सोमवार (द्वितीया)
ब्रह्मचारिणी माता पूजा
शुभ रंग: सफेद
तीसरा दिन
13 अक्टूबर 2026, मंगलवार (तृतीया)
चन्द्रघंटा माता पूजा
शुभ रंग: लाल
चौथा दिन
14 अक्टूबर 2026, बुधवार (चतुर्थी)
कूष्माण्डा माता पूजा
शुभ रंग: गहरा नीला
पाँचवा दिन
15 अक्टूबर 2026, गुरुवार (पंचमी)
स्कन्द माता पूजा
शुभ रंग: पीला
छठा दिन
16 अक्टूबर 2026, शुक्रवार (षष्ठी)
कात्यायनी माता पूजा
शुभ रंग: हरा
सातवां दिन
17 अक्टूबर 2026, शनिवार (सप्तमी)
कालरात्रि माता पूजा
शुभ रंग: ग्रे
आठवां दिन
18 अक्टूबर 2026, रविवार (सप्तमी)
कालरात्रि व महागौरी माता पूजा
शुभ रंग: बैंगनी
नौंवा दिन
19 अक्टूबर 2026, सोमवार (अष्टमी)
महागौरी व दुर्गा अष्टमी पूजा
शुभ रंग: नीलापन लिए हरा
दसवां दिन
20 अक्टूबर 2026, मंगलवार (नवमी)
सिद्धिदात्रि माता पूजा
महा नवमी, कढ़ाई, कंचका पूजा
नवरात्रि पारण व विजयदशमी
नवरात्रि पूजा विधि (Navratri Pooja Vidhi)
नवरात्रि के दौरान माता दुर्गा की पूजा की तैयारी पहले चरण विशेष रूप से कलश की स्थापना के साथ शुरू होती है। मैं यहां नवरात्रि पूजा की सम्पूर्ण विधि का विस्तृत विवरण दे रहा हूं:
घटस्थापना (Ghatasthapana)
नवरात्रि से एक दिन पहले घटस्थापना की जाती है, जिसके माध्यम से देवी मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। घटस्थापना के लिए साफ मिट्टी का एक पात्र लिया जाता है जिसे साथ उपजाऊ मिट्टी से आधा भर लें। अब उसमें जौं के बीज बो दें। इन बीजों को साफ पानी से सींचकर अगले नौ दिनों तक बढ़ने के लिए छोड़ दें।
इस मिट्टी के पात्र को देवी माता के पूजा स्थान पर रखा जाता है और देवी दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर के सामने यहां प्रत्येक दिन सुबह और शाम को दीपक और धूप जलाकर पूजा की जाती है।
कलश स्थापना (Kalash Sthapana)
नवरात्रि के पहले दिन कलश की स्थापना की जाती है। कलश की स्थापना शुभता और मंगल का प्रतीक मानी जाती है। इसके लिए घर में एक पवित्र स्थान का चयन किया जाता है, स्थान की साफ-सफाई करके वहां गंगा जल छिड़क कर पवित्र कर लें। अब इस पवित्र स्थान पर गंगाजल या स्वच्छ जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें।
कलश में एक सुपारी, एक हल्दी की गांठ, दूभ, दाभ, और थोड़े से अक्षत डालें फिर उस पर सात पत्ते वाली आम की टहनी रखें और अब उस पर लाल कपड़े में लपेटकर नारियल रख दें। कलश को फूलों की माला से सजा लें। इस प्रकार नवरात्रि की पूजा विधि की शुरुआत हो जाती है।
नौ देवियों की पूजा-अर्चना और उनकी कहानियाँ
नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान आदिशक्ति भगवती दुर्गा माता के नौ रूपों की पूजा की जाती है। माता के इन रूपों को नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है। हर दिन मां दुर्गा के एक अलग रूप की विशेष पूजा की जाती है। देवी दुर्गा के रूप से जुड़ी कहानियाँ और लीलाएं भक्तों का आध्यात्मिक और धार्मिक रूप में मार्गदर्शन करती हैं। चलिए एक एक करके माता के सभी रूपों की पूजा विधि और कथा के बारे में जानते हैं:
पहला दिन: शैलपुत्री (Shailputri) माता की कथा व पूजा-अर्चना
नवरात्र का पहला दिन माता शैलपुत्री देवी की पूजा के साथ शुरू होता है। शैलपुत्री का अर्थ है ‘पर्वत की पुत्री’, क्योंकि ये पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। माता शैलपुत्री को देवी मां दुर्गा का पहला स्वरूप माना जाता है। इनके बाएं हाथ में त्रिशूल और दाएं हाथ में कमल का फूल रहता है। नवरात्र के पहले दिन माता के इसी रूप में इनको पूजा जाता है। आज के दिन साधक का मन मूलाधार चक्र में स्थित होता है।
Shailaputri Mata
कथा: माता शैलपुत्री ने पूर्व जन्म में माता सती के रूप में राजा प्रजापति दक्ष के यहां कन्या रूप में जन्म लिया था, जोकि उस जन्म में भगवान शिव की पत्नी बनी थी। माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव के अपमान से क्रोधित होकर योग अग्नि में आत्मदाह कर लिया था।
अगले जन्म में माता ने फिर पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया और शैलपुत्री के रूप में जानी गईं और फिर इनका विवाह भोले शंकर जी से हुआ। शैलपुत्री के अलावा माता को पार्वती और हैमवती के नाम से भी जाना जाता है। माता के शैलपुत्री रूप में पूजा करने से मनुष्य को अपने जीवन में स्थिरता और शक्ति की प्राप्ति होती है।
पूजा विधि: मां शैलपुत्री की पूजा में भक्तजन उन्हें सफेद वस्त्र और सफेद फूल अर्पित करते हैं। माता का आह्वान, प्रार्थना और पूजन करने के लिए मंत्र-
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते। ऊँ देवी शैलपुत्री नमः। या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अब माता की आरती करें। इसके साथ ही आप दुर्गा सप्तशती का पाठ भी करना चाहिए। प्रथम नवरात्र के दिन व्रत रखने से मन और आत्मा शुद्ध होती है।
दुसरा दिन: ब्रह्मचारिणी (Brahmacharini) माता की कथा व पूजा-अर्चना
दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। यह देवी मां तपस्या और संयम की देवी मानी जाती हैं। ब्रह्मचारिणी का शाब्दिक अर्थ है ‘तपस्विनी’ जो ब्रह्मचर्य का पालन करने वाली। माता का स्वरूप हमेशा ज्योतिर्मय रहता है, इनके बाएं हाथ में जपमाला और दाएं हाथ में कमंडल रहता है। नवरात्र का दुसरा दिन ब्रह्मचारिणी देवी जी को समर्पित है। इस दूसरे नवरात्र में साधना करने वाले का मन स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होता है।
Brahmacharini Mata
कथा: पूर्व जन्म में माता का जन्म पर्वतराज हिमालय की कन्या के रूप में हुआ था, तब नारद मुनि जी के उपदेश से प्रेरित होकर ब्रह्मचारिणी देवी ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कंई हजार वर्षों की कठिन तपस्या की। इसी कारण माता का शरीर क्षिण हो गया तब ब्रह्मा जी ने उनकी कठिन तपस्या से प्रभावित होकर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त होने का आशीर्वाद दिया और तपस्या को त्याग कर अपने पिता के साथ जाने के लिए आग्रह किया।
इस प्रकार उमा देवी को भगवान शिव पति रूप में प्राप्त हुए। आपको बता दूं कि माता को अर्पणा और उमा देवी के नाम से भी जाना जाता है। देवी मां उमा जी ने हजारों वर्षों तक केवल फल और पत्तियों का सेवन किया और कठोर तपस्या की, इसी कारण इन्हें देवी ब्रह्मचारिणी कहा गया। उनकी इस रूप में पूजा करने से भक्तों को तप और धैर्य का आशीर्वाद हमेशा प्राप्त होता है।
पूजा विधि: ब्रह्मचारिणी देवी मां की पूजा घी का दीपक और धूप जलाकर की जाती है और उन्हें सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं। माता का आह्वान, प्रार्थना और पूजन करे और इस मंत्र के उच्चारण उपरांत पुष्पांजलि अर्पित करें। मंत्र-
पूजा विधि: ब्रह्मचारिणी देवी मां की पूजा घी का दीपक और धूप जलाकर की जाती है और उन्हें सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं। माता का आह्वान, प्रार्थना और पूजन करे और इस मंत्र के उच्चारण उपरांत पुष्पांजलि अर्पित करें। मंत्र-
सर्वमंगल मांगल्ये सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते। ऊँ देवी ब्रह्मचारिणी नमः। या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
दधाना करपदमाभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मचि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
पुष्प देवी मां के चरणों में समर्पित करें। अब दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। इस दिन ब्रह्मचारिणी देवी के मंत्रों का जाप करने से भक्तों को शांति और स्थिरता, धैर्य, परिश्रम करने की प्रेरणा मिलती है।
तीसरा दिन: चंद्रघंटा (Chandraghanta) माता की कथा व पूजा-अर्चना
नवरात्रि के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा देवी की पूजा होती है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा नाम से संबोधित किया जाता है। यह देवी मां वीरता और साहस की प्रतीक हैं। इनका रंग स्वर्ण के समान है। माता के दस हाथ हैं जिनमें खड्ग, बाण इत्यादि अस्त्र-शस्त्र सुशोभित होते हैं। इस दिन साधक का मन मणिपुर चक्र में स्थित होता है।
Chandraghanta Mata
कथा: माता पार्वती ने भगवान शिव से विवाह के उपरांत चंद्रघंटा माता का रूप धारण किया। इस रूप में माता पार्वती युद्ध में दुष्टों और राक्षसों का नाश करती हैं और अपने भक्तों और देवताओं की रक्षा करती है, और सभी को डर और नकारात्मकता से मुक्त करती हैं।
पूजा विधि: माता चंद्रघंटा देवी की पूजा में भक्त उन्हें सुनहरे रंग के वस्त्र और फल समर्पित करते हैं। नवरात्र के इस दिन देवी के मंत्रों का जाप करने से भक्त को भय से मुक्ति मिलती है। प्रातः स्नानादि के उपरांत पूजा शुरू करें और माता का आह्वान, प्रार्थना और पूजन आरम्भ करें। मंत्र के उच्चारण के उपरांत माता के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित करें। मंत्र-
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते। ऊँ देवी चन्द्रघंटाय नमः। या देवी सर्वभूतेषु। माँ चन्द्रघंटाय रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
पुष्प माता के चरणों में समर्पित कर दें। अब माता जी की आरती करें और क्षमा याचना करें।
चौथा दिन: कूष्माण्डा (Kushmanda) माता की कथा व पूजा-अर्चना
नवरात्रि के चौथे दिन कूष्माण्डा माता की पूजा होती है। माना जाता है कि कूष्माण्डा देवी की मुस्कान से इस सृष्टि का आरंभ हुआ था। नव दुर्गा के इस देवी रूप को स्वास्थ्य और समृद्धि की देवी का प्रतीक माना जाता है। शेर पर सवार इन माता को अष्टभुजा माता के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इनके आठ हाथ है जिनमें कमण्डल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र और गदा और आठवें हाथ में जपमाला इत्यादि सुशोभित होते हैं। इस दिन साधक का मन अनाहत चक्र में स्थित होता है।
Kushmanda Mata
कथा: कहा जाता है कि जब सृष्टि का कोई नामोनिशान मौजूद नही था और चारों ओर अंधकार ही अंधकार था, तब देवी माता कूष्माण्डा ने अपनी मुस्कान से सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना की। देवी दुर्गा का यह रूप ब्रह्मांड की उत्पत्ति का कारण माना जाता है। माता को कुष्मांड की बलि बहुत पसंद हैं। इसी कारण माता के इस रूप का नाम कूष्माण्डा पड़ा है।
पूजा विधि: इस चौथे दिन भक्त देवी की पूजा में हरी सब्जियों के साथ नारियल का भोग लगाते हैं। माता कूष्माण्डा देवी की पूजा-अर्चना से भक्तों को दीर्घायु, स्वास्थ्य के साथ समृद्धि, यश और बल के साथ सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
नीचे दिए मंत्रों से माता के चरणों में पुष्प समर्पित करें-
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते। ऊँ देवी कूष्माण्डाय नमः। या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डाय रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
पुष्प इत्यादि को माता के चरणों में समर्पित करें और अब दुर्गा सप्तशती के अगले अध्याय का अध्ययन करें। अंत में आरती करें और क्षमा याचना करें।
पांचवां दिन: स्कंदमाता (Skandamata) माता की कथा व पूजा-अर्चना
पांचवे नवरात्र के दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। यह देवी माँ कार्तिकेय भगवान की माता हैं, कार्तिकेय देवता को स्कंद भी कहा जाता है। देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बनकर लड़े थे। इस दिन भक्त का मन विशुद्ध चक्र में व्यवस्थित हुआ माना जाता है। स्कंदमातृस्वरूपणी माता की चार भुजाएं हैं जिनमें नीचे के बांएं हाथ में भगवान स्कन्द को पकड़े हुए है और उपर के दोनों हाथों में कमल सुशोभित है, नीचे के बांएं हाथ से भक्तों को आशीर्वाद दे रही हैं। माता का रंग शुभ्र है। कमलासन पर विराजमान स्कंदमाता मातृत्व और प्रेम की प्रतीक मानी जाती हैं। माता की सवारी सिंह है।
Skandamata
कथा: स्कंदमाता माता पार्वती का एक रूप हैं। स्कंद जिन्हें कार्तिकेय के नाम से जाना जाता है वो युद्ध के देवता माने जाते हैं। भगवान स्कंद ने देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति के रूप में भाग लिया था। इस संग्राम में उन्होंने असुरों का नाश किया था। स्कंद की माता होने के कारण माता पार्वती के इस रूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। यह मां दुर्गा का पंचम स्वरूप है। मातृत्व की देवी स्कंदमाता की पूजा करने से संतानहीन भक्तों को संतान सुख और मातृत्व का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पूजा विधि: स्कंदमाता की पूजा में पीले पुष्पों को समर्पित किया जाता है और फलों का भोग लगाया जाता है। माता की कृपा से सभी भक्तों को पारिवारिक सुख, समृद्धि और संतान सुख मिलता है। माता के सामने दीपक जलाकर, पवित्र भाव से पीले पुष्पों को नीचे लिखे मंत्र के उच्चारण उपरांत समर्पित करें। मंत्र-
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते। ऊँ देवी स्कंदमाताय नमः। या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कंदमाताय रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
सिंहासनगता नित्यं पदमाश्रितकरद्धया । शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ।l आवाहयामि स्थाप्यामि ध्यामि ततो नमस्कार करोमि। गंधम् पुष्पं दीपं धूपं नैवेद्यम् समर्पयामि। चरणों में पुष्प समर्पित कर दें और आरती करें और क्षमा याचना करें।
छठा दिन: कात्यायनी (Katyayani) माता की कथा व पूजा-अर्चना
नवरात्रि के छठे दिन कात्यायनी माता की पूजा की जाती है। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसी कारण दुर्गा माता के इस रूप को कात्यायनी माता कहा जाता है। छठे दिन भक्तों का मन आज्ञा चक्र में अवस्थित होता है। इस समय भक्त अपना सर्वस्व माता के चरणों में समर्पित कर देता है। आशीर्वाद स्वरूप भक्तों को मोक्ष, अर्थ, धर्म और काम चारों प्रकार के फल प्राप्त होते हैं। इस दिन की श्रद्धा पूर्वक विशेष पूजा से भक्तों के सभी बिगड़े काम बन जाते हैं। कात्यायनी देवी की पूजा करने से सभी प्रकार के शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
Katyayani Mata
कथा: माता कात्यायनी देवी का जन्म महिषासुर का नाश करने के लिए हुआ था। उन्होंने अवतरित होकर महिषासुर का वध किया और देवताओं की रक्षा की तथा सारे ब्रह्माण्ड और संसार को बुराई से मुक्त किया। माता कात्यायनी देवी के जन्म की कथा इस प्रकार है:
महर्षि कात्यायन ने मां अंबे की उपासना करते हुए बहुत सालों तक तपस्या की जिससे मां अंबा ने प्रसन्न होकर कात्यायन ऋषि को दर्शन दिए और मनचाहा आशीर्वाद मांगने के लिए कहा। तब महर्षि कात्यायन ने अंबाजी से आग्रह किया कि वह उनकी पुत्री के रूप में जन्म ले और उन्हें संतान सुख दें। अंबाजी तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गई। कुछ समय के बाद कात्यायन ऋषि के यहां त्रिदेव के अंश स्वरूप एक कन्या का जन्म हुआ और कात्यायन ऋषि के नाम पर जिनका नामकरण हुआ और कात्यायनी देवी के नाम से जाना जाने लगा। देवासुर संग्राम में कात्यायनी देवी ने देवताओं की रक्षा की और महिशासुर का अंत किया।
इसके अलावा एक कथा ओर प्रचलित है कि भगवान कृष्णा को पति रूप में पाने के लिए बृज की गोपियों ने कात्यायनी देवी की पूजा-अर्चना यमुना नदी के कालिंदी तट पर की थी, तभी से कात्यायनी देवी बृजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित है। माता का रूप स्वर्ण रंग लिये भव्य और दिव्य है। देवी की चार भुजाएं हैं और अभय मुद्रा और वरमुद्रा धारण किए हुए हैं और तलवार, कमल पुष्प भी माता के हाथों में सुशोभित है।
पूजा विधि: मां कात्यायनी देवी की पूजा में सुगंधित फूल और घी का दीपक अर्पित किया जाता है। उनकी कृपा से सभी भक्तों को अपने जीवन में साहस और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। मंत्रों के साथ माता को फूल अर्पित करते हैं। माता का आह्वान, प्रार्थना और पूजन करने के लिए मंत्र-
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते। ऊँ देवी कात्यायनी नमः। या देवी सर्वभूतेषु। माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
चन्द्रहासोज्वलकरा शादूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याह्देवी दानवघातिनी I आवाहयामि स्थाप्यामि ध्यामि ततो नमस्कार करोमि। गंधम् पुष्पं दीपं धूपं नैवेद्यम् समर्पयामि।
माता के चरणों में पुष्प अर्पित करें। अब दुर्गा सप्तशती के अगले अध्याय का पाठ करें। आरती व परिक्रमा करने के साथ पूजन का समापन करें।
सातवां दिन: कालरात्रि (Kaalratri) माता की कथा व पूजा-अर्चना
सातवें दिन देवी कालरात्रि माता की पूजा की जाती है। कालरात्रि देवी का रूप बहुत ही अंधकारमय भयानक है, बाल बिखरे हुए हैं। मां दुर्गा का यह रूप सभी प्रकार के दुष्टों का विनाश करने वाला है। कालरात्रि माता हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों का नाश करती हैं। इस सातवें दिन उपासक के मन में सहस्त्रार चक्र का प्रभाव रहता है।
Kalaratri Mata
कथा: मां दुर्गा ने देवी कालरात्रि माता का यह रूप उन सभी राक्षसों का विनाश करने के लिए लिया गया था, जो देवताओं और मनुष्यों को आतंकित करते रहते थे। इनका यह रूप अंधकार और बुराई का अंत करने वाला है।
तीन नेत्रों वाली यह देवी पल भर में दुष्ट आत्माओं का विनाश करती है। स्वांस से ज्वालाएं निकलती रहती हैं। इनका वाहन गधा है और चार भुजाओं में उपर के दाहिने हाथ से वरमुद्रा में सभी भक्तों को आशीर्वाद देती हैं और नीचे के दाहिने हाथ से अभय मुद्रा प्रकट करती हैं। उपर के बांएं हाथ में खड्ग और नीचे के हाथ में लोहे का कांटा लिए हुए है। इनका एक नाम शुभंकरी देवी भी है। भक्तों पर देवी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहती है।
पूजा विधि: मां कालरात्रि देवी की पूजा में नीले या काले वस्त्र और पुष्प समर्पित किये जाते हैं। माता को उबले हुए चावल के प्रसाद का भोग लगाया जाता है। कालरात्रि देवी पूजा करने से भक्त को दुष्ट आत्माओं, बुराई और भय से सदा के लिए मुक्ति मिलती है। माता के चरणों में पुष्प आदि समर्पित करने के लिए नीचे दिए गए मंत्र उच्चारित करें-
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते। ऊँ देवी कालरात्रि नमः। या देवी सर्वभूतेषुमाँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
और चरणों में पुष्प समर्पित कर दें। अब दुर्गा सप्तशती के अगले अध्याय का पाठ करें। आरती व परिक्रमा करने के साथ पूजन का समापन करें।
आठवां दिन: महागौरी (Mahagauri) माता की कथा व पूजा-अर्चना
आठवां दिन देवी महागौरी माता की पूजा के लिए है। महागौरी देवी को शांति, पवित्रता, और सौंदर्य के प्रतीक रूप में माना जाता है। इनका स्वरूप बहुत ही उज्ज्वल और गोरा वर्ण है। इसी कारण मां दुर्गा के इस शक्ति स्वरूप को महागौरी कहा जाता है। श्वेत वस्त्र और आभूषण धारण किए माता की आयु आठ साल कही गई है। मां दुर्गा के इस रूप की उपासना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
Mahagauri Mata
कथा: कहा जाता है कि माता पार्वती ने महागौरी देवी बनकर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए बहुत कठोर तपस्या की थी। ‘नारद पाञ्चरात्र’ में इनकी शिव को प्राप्त करने की प्रतिज्ञा के विषय में लिखा है कि ‘ब्रियेऽहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं महेश्वरात्’। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि इनका शरीर श्याम वर्ण का हो गया था। भगवान शिव ने अपनी कृपा से जब इनको गंगाजल से स्नान करवाया तो मैया रानी का रंग अत्यंत गोरा हो गया। इसी गौर वर्ण के कारण मैया का नाम महागौरी पड़ा।
गोस्वामी तुलसीदास भी अपनी पंक्तियों में देवी महागौरी की प्रतिज्ञा का बखान करते हुए कहते हैं कि-
जन्म कोटिलगिरगर हमारी। बरउं शंभु न तो रहउं कुआरी।। रामचरित्रमानस, बालकाण्ड चोपाई-80
अर्थात: माता गौरी कहती हैं कि करोडो जन्मो तक मेरी यही जिद्द रहेगी, विवाह करुँगी तो भोले शंकर जी से ही करुँगी नहीं तो हमेशा कुआँरी ही रहूंगी।
मैया की सवारी वृषभ है और चार भुजाओं वाली माता के उपर के दाएं हाथ में अभय मुद्रा एवं नीचे के हाथ में त्रिशूल और उपर के बाएं हाथ में डमरू, नीचे के हाथ में वरमुद्रा सुशोभित है। देवी दुर्गा के इस रूप की पूजा अराधना करने से सिद्धियां प्राप्त होती हैं। मनवांछित फल प्राप्त होता है।
पूजा विधि: देवी महागौरी की पूजा में हमेशा सफेद फूल, सफेद वस्त्र समर्पित किए जाते हैं और दूध का भोग लगाया जाता है। पवित्र मन से इनकी पूजा-अर्चना से मन में और घर परिवार में शांति और समृद्धि बनी रहती है। चलिए अब पूजा शुरू करते हैं। अंजलि में पुष्प लिजिए और मंत्र बोलें-
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते। ऊँ देवी महागौरी नमः। या देवी सर्वभूतेषुमाँ महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
और चरणों में श्वेत फूल समर्पित कर दें और दुर्गा सप्तशती के अगले अध्याय का पाठ करें और आरती, क्षमा, याचना,प्रदिक्षणा से आठवें दिन की पूजा का समापन करें।
नौवां दिन: सिद्धिदात्री (Siddhidatri) माता की कथा व पूजा-अर्चना
नवरात्रि के नौवें दिन सिद्धिदात्री माता की पूजा-अर्चना की जाती है। सिद्धिदात्री का अर्थ है ‘सिद्धियों की दात्री’ यानी जो सभी प्रकार की आठ सिद्धियाँ अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आपको प्रदान करती हैं। इन आठ सिद्धियों का वर्णन मार्कंडेय पुराण में मिलता है।
Siddhidhatri Mata
इसके अलावा ब्रह्मवैवर्त्पुराण के श्री कृष्ण जन्मखंड में सिद्धियों की संख्या 18 बताई गई हैं।अणिमा, सर्वकामावसायिता, सृष्टि, लघिमा, सर्वज्ञत्व, संहारकरणसामर्थय, प्रास्ति, दूरश्रबण, अमरत्व, प्राकाम्य, परकायप्रवेशन, सर्वन्यायकत्व महिमा, वाक् सिद्धि, भावना, ईशित्व वाशित्व, कल्पवृक्षत्व, सिद्धि ।
सच्चे मन से की गई देवी सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना से प्रसन्न होकर माता अपने भक्तों को मोक्ष और सभी प्रकार की दिव्य सिद्धियों का आशीर्वाद देती हैं।
कथा: माता सिद्धिदात्री देवी की कथानुसार, जब संसार की रचना हुई, तब भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा ने माता के आशीर्वाद स्वरूप आठ सिद्धियों को प्राप्त किया था। माता को सिद्धियों और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इनकी पूजा से भक्तों को दिव्य शक्तियों और सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
माता ने भगवान शंकर जी को भी सिद्धियों का आशीर्वाद दिया था, जिससे शिवजी अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट हुए थे। अर्धनारीश्वर शक्ति और शिव के एकत्व रूप का प्रतीक है। देवी मां सिद्धिदात्री के चार भुजाएं हैं, दाईं तरफ के उपर वाले हाथ में गंदा और नीचे के हाथ में चक्र तथा बाईं तरफ के उपर वाले हाथ में कमल पुष्प और निचले हाथ में शंख सुशोभित रहता है। और इनका वाहन सिंह और माता कमलासन पर भी विराजमान होती हैं। देवी सिद्धिदात्री अपने भक्तों की सभी प्रकार की लौकिक पारलौकिक मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।
पूजा विधि: देवी सिद्धिदात्री की पूजा-आराधना में भक्त उन्हें लाल वस्त्र और लाल फूल समर्पित करते हैं। सच्चे मन और शुद्धता से इनकी पूजा करने से सभी प्रकार की सिद्धियों, ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है। देवी के आशीर्वाद से भक्तों को हर क्षेत्र में कामयाबी मिलती है।
देवी सिद्धिदात्री को प्रसन्न करने के लिए नीचे दिए मंत्रों का उच्चारण करते हुए लाल पुष्प समर्पित करने चाहिए। मंत्र-
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते। ऊँ देवी सिद्धिदात्री नमः। या देवी सर्वभूतेषु। माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
सिब्धगन्धर्वयक्षाहैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।। आवाहयामि स्थाप्यामि ध्यामि ततो नमस्कार करोमि। गंधम् पुष्पं दीपं धूपं नैवेद्यम् समर्पयामि।
और चरणों में लाल फूल समर्पित कर दें और दुर्गा सप्तशती के सम्पूर्ण पाठ समाप्त कर दें और आरती, क्षमा, याचना,प्रदिक्षणा से अंतिम नौंवे दिन की पूजा का समापन करें और गाय और कन्याओं को भोजन कराएं।
दुर्गा सप्तशती का पाठ (Durga Saptashati Paath)
नवरात्रि के दौरान सभी भक्तों को दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए। इसका पाठ करना बहुत ज्यादा शुभ माना जाता है। दुर्गा सप्तशती में देवी दुर्गा माता के पराक्रम, शक्ति, और उनके द्वारा किए गए महिषासुर के वध की कथा कही गई है। महिषासुर का वध करने के कारण ही माता को महिषासुर मर्दनी कहा गया है। दुर्गा सप्तशती का पाठ श्रद्धा और समर्पण के साथ करने से भक्तों पर मैया की अनुकंपा दोगुनी हो जाती है। दुर्गा सप्तशती में कुल मिलाकर 13 अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय का अपना एक अलग महत्व है।
नवरात्रि के नौ दिन तक प्रातः नहा-धोकर मैया के नौ रात्र तिथि दिन अनुसार तय देवी की पूजा-अर्चना करने के उपरांत सप्तशती का पाठ करना चाहिए। पाठ करते समय मन साफ और ध्यान अध्याय के पाठ के भाव में होना चाहिए।
आरती और प्रसाद (Aarti Aur Prasad)
हमेशा ध्यान रखें कि पूजा के बाद माता की आरती जरूर की जाती है और माता से भूल चूक के लिए क्षमा याचना की जाती है। इसके उपरांत सभी भक्तों में मैया रानी के लिए बनाया गया प्रसाद वितरित किया जाता है। जिस देवी के नाम का नवरात्रि पूजन किया गया है उसी माता को ध्यान में रखते हुए प्रसाद बनाना चाहिए। ज्यादातर प्रसाद में फलों, मिठाइयों, और पंचामृत का भोग लगाया जाता है।
उपवास करने वालों के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों को भी नवरात्रि के दौरान केवल सात्विक भोजन करने की सलाह दी जाती है। सात्विक भोजन शरीर और मन को शुद्ध करने में बहुत मदद करता है। सात्विक आहार इन पवित्र दिनों में आपके मन को तामसिक विचारों से दूर रखता है।
कन्या पूजन (Kanya Poojan)
परम्परा अनुसार नवरात्रि के आठवें या नौवें दिन कन्या पूजन करें। नवरात्र पूजन में कन्या भोज के आयोजन का विशेष महत्व होता है। इस दिन 9 कन्याओं की पूजा और उनको भोजन करवाया जाता है। कन्या रूप में घर पर आई नौं देवियों को कुछ न कुछ उपहार जरूर दिया जाता है। इस प्रकार के आयोजन से भक्त सांकेतिक रूप में कन्या पूजन के माध्यम से नौ देवियों की ही पूजा करते हैं। दुर्गा माता के नौ रूपों को कन्याओं का रूप ही माना जाता है। कन्या पूजन और भोज का आयोजन नवरात्रि के सबसे पवित्र अनुष्ठानों में से एक है।
कन्या पूजन के दौरान सभी कन्याओं के पैर धोकर आसन पर बिठाया जाता है, और उनके चरणों में हल्दी और कुमकुम लगाया जाता है। रक्षा सूत्र और कुमकुम का तिलक भी बालिकाओं को लगाया जाता है। इसके उपरांत उन्हें विशेष रूप से कन्याओं के लिए तैयार भोजन उनको परोसा जाता है। भोजन उपरांत सभी कन्याओं को उपहार, लाल चुनरी और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। इस प्रकार नवरात्रि के पर्व का समापन करने से भक्तों पर माता रानी की कृपा बरसती है और जीवन में हमेशा सुख-शांति बनी रहती है।
नवरात्रि नवदुर्गा की पूजा का महत्व (Significance of Worshiping the Navadurga in Navratri )
नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ ‘नौ रातें’ होता है। ‘नवानां रात्रीणां समाहार: नवरात्रम्’ अर्थात नौं रात्रियों योग नवरात्र है। यह पवित्र त्योहार प्रत्येक साल में दो बार मनाया जाता है, एक चैत्र नवरात्रि (मार्च से अप्रैल में) और शारदीय नवरात्रि (सितंबर से अक्टूबर में)। वैसे श्रीदेवीभागवत् पुराण में बताया गया है कि वर्ष में चार नवरात्र होते हैं, 1.चैत्र वसंत नवरात्र 2. आषाढ़ गुप्त नवरात्र 3. आश्विन शारदीय नवरात्र 4. माघ गुप्त नवरात्र, परन्तु मुख्य रूप से दो दो प्रकार के नवरात्र ही समाज में प्रचलित हैं, चैत्र वसंत नवरात्र और आश्विन शारदीय नवरात्र।
Navaratri के दौरान देवी भगवती मां दुर्गा की पूजा की जाती है। यह पूजा देवी दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित होती है, जो शक्ति, साहस, और भक्ति का प्रतीक हैं। हर देवी एक विशिष्ट गुण की प्रतीक मानी जाती हैं, और उनकी पूजा से भक्तों को विभिन्न प्रकार के आशीर्वाद और सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान किये जाने वाले पूजा-पाठ को पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से वर्णित किया गया है। जैसे कि मार्कंडेय पुराण, जिसमें दुर्गा सप्तशती का उल्लेख मिलता है, जो देवी मां दुर्गा की महिमा का बखान करता है। इसके साथ अन्य हिंदू धार्मिक ग्रंथों में भी नवरात्रि और दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा का विस्तार पूर्वक विवरण मिलता है।
Navratri का मुख्य उद्देश्य माता दुर्गा की पूजा और शक्ति की आराधना करना है। इस समय को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है, और धार्मिक रूप से यह भगवान राम की रावण पर विजय और महिषासुर पर दुर्गा माता की विजय से भी जुड़ा हुआ है।
यह पवित्र पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, अपितु यह आत्मशुद्धि, संयम और ध्यान का भी समय होता है। यह हम सभी को भक्ति के माध्यम से शक्ति प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, नवरात्रि पर्व का उद्देश्य यह है कि हम अपनी कमजोरियों और बुराइयों को समाप्त करके अपने शरीर और आत्मा को शुद्ध कर सकें।
नवरात्रि की धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता
नवरात्रि के नौ दिन भक्तों के लिए आध्यात्मिक शुद्धि के दिन होते हैं। हर दिन देवी दुर्गा के एक रूप की पूजा होती है, जो हमारे जीवन में आने वाली अलग-अलग समस्याओं और चुनौतियों से लड़ने के लिए आवश्यक शक्तियों का प्रतीक रूप मानी जाती हैं। प्रत्येक देवी के अपने अलग-अलग गुण होते हैं, जो हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं को बेलेंस करने में हम सबकी सहायता करते हैं।
हमारे लिए यह त्योहार केवल एक धार्मिक कर्तव्य ही नहीं है, बल्कि यह हमारे लिए एक मानसिक और शारीरिक डिटॉक्स भी है। उपवास और पूजा-अर्चना के माध्यम से सभी भक्तजन अपने शरीर और आत्मा को शुद्ध करने का प्रयास करते हैं। नवरात्रि के दौरान किया गया योग ध्यान हमारे शरीर और मन को संतुलित करता है।
Navaratri का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
Navratri पर्व का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पहलू भी है। इन नौं दिनों में केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नही होते बल्कि इन पवित्र दिनों में सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक नृत्य जैसे गरबा और डांडिया का भी आयोजन होता है। यह त्योहार भारत के सभी प्रदेशों में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है, परन्तु दुर्गा माता की पूजा, अराधना, उपासना हर जगह लगभग समान रूप से की जाती है।
माता दुर्गा की मिट्टी की मूर्ति बनाने की परम्परा भारत के कंई राज्यों में प्राचीन काल से चली आ रही है। इसी मिट्टी की मूर्ति की पूजा नवरात्रि के समय की जाती है, और नवरात्र के उपरांत जल में मूर्ति को विसर्जित कर दिया जाता है। इतिहासिक तौर पर यह परम्परा हजारों वर्षों से चली आ रही है। इस प्रकार नवरात्रि का पर्व इतिहासिक और सांस्कृतिक तौर पर बहुत ज्यादा महत्व रखता है।
नवरात्रि के नौं व्रत का वैज्ञानिक महत्व (Scientific perspective on Navratri fasting)
नवरात्रि केवल एक धार्मिक और आध्यात्मिक पर्व नहीं है, बल्कि इसका वैज्ञानिक महत्व भी सामने आता है। देखिए, नवरात्र वर्ष में दो बार आते हैं, एक बार वसंत ऋतु में और दूसरी बार शरद ऋतु में, जोकि भारत में मौसम के परिवर्तन का समय होता हैं। इस समय हमारे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो जाती है और अनेक प्रकार की मौसमी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इस समय उपवास करने से शरीर का पाचन तंत्र आराम करता है और हमारा शरीर डिटॉक्सिफाई होता है, जिससे हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत हो जाती है।
उपवास के स्वास्थ्य पर प्रभाव (Effects of fasting on health)
पाचन तंत्र को आराम: उपवास के दौरान हल्का और सात्विक भोजन किया जाता है जिससे पाचन तंत्र को आराम मिलता है और यह हमारे शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में बहुत मदद करता है।
ऊर्जा का संचार: उपवास के दौरान संयम और ध्यान योग करने से हमारे अंदर मानसिक और शारीरिक ऊर्जा का संचार होता है। इससे शरीर को आराम मिलता है, और हमारा मन भी शांत रहता है।
वजन नियंत्रण: व्रत के दौरान हल्का आहार करने के कारण हमारे शरीर का वजन संतुलित रहता है। आपको पता ही होगा कि उपवास करने और हल्की डाइट लेने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है, जिससे हमारे शरीर की अतिरिक्त चर्बी कम हो जाती है।
मानसिक शांति: इस दौरान हम ध्यान और योग के माध्यम से मानसिक शांति प्राप्त करने की कौशिश करते हैं। इससे हमारा तनाव और चिंता कम होती है, और हमें मानसिक शांति मिलती है और संतुलन बना रहता है।
नवरात्रि व्रत क्यों किए जाते हैं? (Navratri Vrat Kyon Kiye Jaate Hain?)
नवरात्रि के व्रत रखने के पीछे कई धार्मिक और वैज्ञानिक कारण से जुड़े हुए हैं। धार्मिक दृष्टि से देखें तो यह व्रत माता दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु किया जाता है।
भक्तों के मन में प्रबल सम्भावना होती है कि नवरात्रि के उपवास और पूजा-अर्चना करने से उनके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आएगी। यह स्वयं को आशावादी बनाए रखने का बहुत ही सटीक माध्यम है। व्रत या उपवास एक उत्तम माध्यम है जिसके द्वारा भक्तजन अपनी आस्था और भक्ति को अपने आराध्य के सामने प्रकट करते हैं।
व्रत या उपवास रखने का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है कि दोनों नवरात्रि के पर्व के दौरान किया गया व्रत शरीर को सही समय पर डिटॉक्स करने का एक माध्यम है। साल में जब भी नवरात्रि का पर्व आता है तो वह वर्ष का वह समय होता है जब मौसम बदल रहा होता है। बिमारियों के पनपने के बहुत ज्यादा चांसेज होते हैं।
एसे समय पर आया नवरात्र का पर्व हमें व्रत के लिए प्रेरित करता है और बिमारियों से बचने के लिए हमारे शरीर को शुद्ध (Detox) करने का काम करता है। व्रत के दौरान हल्का और सात्विक भोजन खाने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का मौका मिलता है। शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है और हमारे पाचन तंत्र भी मजबूत होता है।
नवदुर्गा पूजा के लाभ (Benefits of Worshiping the Navadurga)
नवरात्रि के पावन अवसर पर मां दुर्गा की पूजा अराधना करने से भक्तों को अनेक प्रकार के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक लाभ प्राप्त होते हैं। चलिए अब नवरात्र में नवदुर्गा पूजा के लाभों की बात करते हैं।
आध्यात्मिक जागृति: नवदुर्गा की पूजा करने से भक्तों को आध्यात्मिक जागृति प्राप्त होती है। नवरात्रि के दौरान की जाने वाली यह पवित्र पूजा आत्मज्ञान और आत्म-शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।
धैर्य और संयम: तप की देवी ब्रह्मचारिणी माता की पूजा से भक्तों को धैर्य और संयम की प्राप्ति होती है। ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा-अर्चना जीवन में तपस्या और संयम के महत्व को समझाती है।
शत्रुओं पर विजय: मां कात्यायनी देवी की पूजा-आराधना से व्यक्ति को अपने जीवन के शत्रुओं और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है। कात्यायनी देवी साहस और शक्ति की प्रतीक हैं। उनकी पूजा-अर्चना से भक्त को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
पवित्रता और शांति: देवी महागौरी की पूजा से भक्तों को पवित्रता और शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। देवी दुर्गा का यह स्वरूप मानसिक और शारीरिक शुद्धता का प्रतीक हैं। माता की कृपा से भक्त को आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
सिद्धियों की प्राप्ति: देवी सिद्धिदात्री की पूजा करने से भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां और ज्ञान प्राप्त होता है। देवी का यह रूप मोक्ष और आध्यात्मिक सिद्धियों का आशीर्वाद प्रदान करता है।
समृद्धि और स्वास्थ्य: माता कूष्माण्डा देवी की पूजा से भक्तों को अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। देवी मां का यह रूप जीवन में संतुलन और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।
भय का नाश: दुर्गा शक्ति के चंद्रघंटा और कालरात्रि रूप की पूजा से मनुष्य के जीवन से सभी प्रकार के भय और नकारात्म प्रभावों का अंत हो जाता है। दुखों का नाश हो जाता है। शक्ति के ये रूप व्यक्ति को जीवन में साहस और सुरक्षा प्रदान करते हैं जिससे उसका जीवन सुखमय बीतता है।
नवरात्रि में उपवास कैसे करें? (Navratri Mein Upvaas Kaise Karein?)
नवरात्रि के दौरान व्रत (उपवास) रखना बहुत पवित्र माना जाता है। हमारे लिए यह केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। नवरात्रि के दौरान उपवास करना बहुत फायदेमंद है। यहां हम विस्तारपूर्वक बता रहे हैं कि नवरात्रि में उपवास कैसे करना चाहिए और कौन-कौन से खाद्य पदार्थ है जो उपवास के दौरान खाने चाहिए इन सबकी जानकारी दे रहे हैं।
सात्विक भोजन (Saatvik Bhojan)
नवरात्रि में ही नही अपितु किसी भी उपवास के दौरान केवल सात्विक और हल्का भोजन करने का नियम होता है। सात्विक भोजन हमारे शरीर और मन को शुद्ध करता है, और हमारे पाचन तंत्र को आराम देता है। यहां हम कुछ खाद्य पदार्थों की जानकारी दे रहे हैं, जो नवरात्रि के व्रत के दौरान उपभोग किए जा सकते हैं:
फल और मेवे जैसे- सेब, केला, पपीता, बादाम, काजू इत्यादि खाने चाहिए।
साबूदाना और आलू से बने व्यंजन खाए जा सकते हैं।
सिंघाड़े का आटे और कुट्टू का आटे से बने खाद्य पदार्थ अच्छे रहते हैं परन्तु कम मात्रा में।
दूध और दूध से बने घरेलु व्यंजनों का सेवन करना चाहिए।
नारियल पानी और ताजे फलों का रस बहुत हितकारी रहता है।
नमक का सीमित उपयोग (Salt Restriction)
हमेशा ध्यान रखें कि व्रत के दौरान साधारण नमक के बजाय सेंधे नमक का उपयोग करना चाहिए। सेंधा नमक प्राकृतिक रूप से मिलता है जो शरीर पर नकारात्मक प्रभाव नही डालता, और इसे उपवास के लिए हमेशा शुद्ध माना जाता है। यह नमक केवल स्वास्थ्य के लिए ही अच्छा नही होता, बल्कि उपवास के दौरान हमारे शरीर में ऊर्जा बनाए रखने में भी मदद करता है।
पर्याप्त जल का सेवन (Hydration is Important)
उपवास के दौरान यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि शरीर में पानी की कभी भी कमी न हो। पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहना चाहिए और कोशिश यह करें कि नारियल पानी, फलों का रस और नींबू पानी जैसे हाइड्रेट रखने वाले पेय पदार्थों का सेवन करते रहें। इस प्रकार हम अपने शरीर में पानी के संतुलन को बना कर रख सकते हैं। इस प्रकार से आप व्रत के दौरान ऊर्जावान महसूस करते रहेंगे।
संयम और ध्यान (Discipline and Meditation)
व्रत या उपवास का मुख्य उद्देश्य मात्र भोजन से परहेज करना नहीं है, बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से संयम का पालन करना भी है। नवरात्रि के दौरान सभी को अपने मन को शांत रखने और ध्यान (Meditation) करने पर जोर देने के लिए कहा जाता है। नवरात्रि के प्रत्येक दिन सुबह और शाम को देवी माता के मंत्रों का जाप और ध्यान करना चाहिए, जिससे सभी को मानसिक शांति प्राप्त हो सके।
पर्याप्त विश्राम (Adequate Rest)
उपवास के दौरान भक्तों को अधिक आराम की आवश्यकता होती है। इसलिए, हमेशा पर्याप्त नींद और आराम लेना जरूरी है। कौशिश करें की अत्यधिक शारीरिक श्रम और तनावपूर्ण गतिविधियों से बचा जा सके, ताकि उपवास के दिनों में आपके शरीर में ऊर्जा बनी रहे।
किन बातों का रखें ध्यान? (Navratri Mein Kin Baaton Ka Dhyaan Rakhein?)
नवरात्रि का पवित्र समय केवल पूजा-पाठ और उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे आचरण, विचारों और कर्मों को शुद्ध करने का भी उचित समय होता है। मैं यहां कुछ महत्वपूर्ण बातें बता रहा हूं, जिनका ध्यान नवरात्रि के दौरान सभी भक्तों को रखना चाहिए:
पवित्रता का पालन करें (Maintain Purity): नवरात्र के नौ दिनों के दौरान पूजा स्थल, घर, और अपने आस-पास की सफाई का विशेष ध्यान रखें। इस दौरान घर को स्वच्छ और पवित्र बनाए रखें। माता के पूजा स्थल पर प्रतिदिन दीपक ज़रूर जलाएं और अगरबत्ती का भी उपयोग करें।
शुद्ध आचरण रखें (Pure Conduct): इस पवित्र पर्व के दौरान हमेशा मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहना चाहिए। नकारात्मक विचारों और कर्मों से बचाव करना बहुत जरूरी है। झूठ बोलने, किसी का दिल दुखाने, और अहंकार से सदा दूर रहें। मैया शेरावाली को समर्पित यह समय आत्मशुद्धि और संयम रखने का है, इसलिए प्रयत्न करें कि आप हमेशा अच्छे कर्म और विचारों को आगे बढ़ाएं।
दान और सेवा (Charity and Service): इस दौरान किए गए दान और सेवा का विशेष महत्व होता है। हमे सामर्थ्य अनुसार जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए। इस पवित्र समय में आप अनेक प्रकार से जरूरतमंदों की सेवा कर र सकते हैं जैसे आर्थिक मदद, भोजन, कपड़े, या अन्य आवश्यक वस्तुएं दान करना इत्यादि। निःस्वार्थ भाव से दान और सेवा के करने से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में धैर्य और शांति का अनुभव होता है।
संयमित दिनचर्या (Disciplined Routine): नवरात्रि के दौरान उपासकों के लिए संयमित दिनचर्या अपनाना बहुत जरूरी होता है। सभी भक्त पूजा-पाठ और उपवास के साथ-साथ नियमित दिनचर्या का संयम के साथ पालन करें। संयमित दिनचर्या से हमारा चित्त और शरीर दोनों शांत और पवित्र रहते हैं।
हिंसा से दूर रहें (Avoid Violence): नवरात्रि के पावन अवसर पर किसी भी प्रकार की हिंसा, चाहे वो मानसिक हो या शारीरिक, उस से हमेशा दूर रहना चाहिए। सभी भक्तजन हमेशा अहिंसा का पालन करें और अपने मन में सभी जीवों के प्रति प्रेम और करुणा का भाव बनाए रखें। वास्तव में यह पवित्र समय सकारात्मक ऊर्जा और उच्च विचारों को अपनाने का है।
नवरात्रि में ध्यान और योग (Navratri Mein Dhyan Aur Yoga)
नवरात्रि के दौरान केवल पूजा और उपवास ही नहीं किया जाता है, बल्कि यह ध्यान और योग में लीन होने का भी सही समय होता है। इस समय भक्तजन ध्यान और योग के माध्यम से अपने शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करते हैं। हर दिन कुछ समय के लिए ध्यान योग करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है और अपने भीतर अद्भुत ऊर्जा का अनुभव होता है।
ध्यान की विधि (How to Meditate During Navratri)
एक शांत स्थान पर बैठ जाएं और अपनी आँखें बंद कर लें।
अपनी साँसों पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करें और गहरी साँसें लें।
धीरे-धीरे अपने मन को सभी नकारात्मक विचारों से मुक्त करें।
ॐ का जाप करें या देवी दुर्गा माता के इस मंत्र का जाप करें- ॐ ऐं हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै।
धीरे-धीरे ध्यान करते हुए अपनी अंतरात्मा से जुड़ने का प्रयास करें।
इस प्रकार नवरात्रि के पावन दिनों में ध्यान और योग करने से मानसिक और शारीरिक शांति का अनुभव होता है। यह इस मुल्यवान समय के उपयोग का सही तरीका है, जिस से हमारा मन पवित्र और शरीर उर्जावान बनता है।
नवरात्रि का समापन और विजयादशमी (Navratri Ka Samapan Aur Vijayadashami)
Navaratri के नौ दिनों की पूजा और व्रत के बाद, दसवें दिन पूरे भारत में विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है जिसे दशहरा भी कहा जाता है। इस दिन भगवान श्री राम जी ने राक्षस राज दशानन रावण का वध किया था। इसी कारण इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। विजयादशमी के दिन देशभर में रामलीला का मंचन किया जाता है और शाम ढले रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के पुतलों का दहन के कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।
प्रतीकात्मक रूप से विजयादशमी का संदेश यह है कि मनुष्य के जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ आएं और कोई उसका कितना भी बुरा करने की कौशिश करें, कितना भी छल करें, अंत में जीत सच्चाई और अच्छाई ही होती है। विजयादशमी का त्योहार हम सभी को सिखाता है कि चाहे कितनी भी विपत्तियां आए, हमें हमेशा धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलना चाहिए, क्योंकि अंततः जीत उन्हीं की होती है जो सत्य और धर्म के मार्ग पर टिके रहते हैं।
इसके अलावा इस दिन देवी मां दुर्गा ने महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। माता के महिषासुर पर विजय के रूप में भी विजयादशमी के दिन को याद किया जाता है। इसलिए इस दिन को शक्ति, साहस और धर्म के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, जो हमारे अंदर और समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने का प्रतीक है।
यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हो जाए, यदि हम सच्चाई के मार्ग पर चलेंगे तो अंततः जीत हमारी ही होगी।
भगवती दुर्ग विसर्जन (Maa Durg Visarjan)
Navaratri के समापन पर देवी दुर्गा की मूर्तियों के विसर्जन की प्रक्रिया को पूर्ण किया जाता है। इस दिन मां दुर्गा को विदा करने से पहले विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है और उन्हें पूजा के उपरांत विदाई दी जाती है। इस दिन को विजयादशमी भी कहा जाता है। घटस्थापना से लेकर मैया के विसर्जन तक की प्रक्रिया प्रतीकात्मक रूप से यह देवी दुर्गा के धरती पर आगमन और उनकी विदाई को दर्शाता है।
विसर्जन कार्यक्रम के दौरान भक्तजन देवी दुर्गा से आशीर्वाद की प्रार्थना करते हैं और देवी मां से अगले वर्ष फिर से आने का आग्रह करते हैं। माता की मूर्ति विसर्जन के साथ ही नवरात्रि के इस पवित्र पर्व का समापन हो जाता है। विजयादशमी के पर्व का प्रभाव भक्तों के जीवन में सदा के लिए बना रहता है। यह पर्व हम सभी को अपने जीवन में संयम, शक्ति, धैर्य और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
FAQs: Navratri Puja
नवरात्रि क्या है और इसे क्यों मनाया जाता है?
नवरात्रि हिंदू धर्म का बहुत ही प्रमुख पर्व है, जो लगभग 9 दिन तक चलता है जिसमे जिसमें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा एक एक करके प्रतिदिन की जाती है। यह पर्व शक्ति, भक्ति और साधना का प्रतीक है। माना जाता है कि इन दिनों देवी की आराधना से नकारात्मक शक्तियों पर विजय, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
9 दिन की नवरात्रि पूजा कैसे करें?
चैत्र या शारदीय नवरात्रि में पहले दिन घटस्थापना करें। प्रतिदिन दुर्गा के नौ रूपों की पूजा, दीप, धूप, फूल और फल अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती का पाठ करें, भोजन और रहनसहन सात्विक रखें और नवमी को कन्या पूजन कर व्रत पूर्ण करें और पारण करें।
नवरात्रि की पहली पूजा कौन सी है?
नवरात्रि की पहली पूजा माता शैलपुत्री जी की होती है। पहले दिन घटस्थापना कर देवी दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। उन्हें सफेद या पीले फूल अर्पित कर सुख-समृद्धि और शक्ति की प्रार्थना करनी चाहिए।
9 दिन का उपवास रखने से क्या होता है?
मन जाता है की नवरात्रि के 9 दिन उपवास रखने से मन और शरीर शुद्ध होते हैं। वास्तव में यह संयम, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने का माध्यम माना जाता है। माता दुर्गा जी की कृपा से मानसिक शांति, आत्मबल और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
उपवास करते समय क्या खाना चाहिए?
नवरात्री उपवास के दौरान हल्का और सात्विक भोजन करना चाहिए। जैसे फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, मूंगफली और सूखे मेवे इत्यादि। पर्याप्त पानी पीना भी सबसे जरूरी है ताकि शरीर में पानी की कमीं न हो और ऊर्जा बनी रहे। इस दौरान अनाज, प्याज और लहसुन से परहेज किया जाता है।
नवरात्रि के 9 दिन कैसे मनाते हैं?
नवरात्रि के 9 दिन भक्तजन डेली मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं। पहले दिन घटस्थापना होती है, फिर डेली पूजा, आरती, मंत्र जाप और व्रत रखा जाता है। इस दौरान सभी भक्त सात्विक भोजन करते हैं। नवमी या अष्टमी को कन्या पूजन कर देवी से सुख-समृद्धि और शक्ति का आशीर्वाद मांगा जाता है और उपवास खोला जाता है।
निष्कर्ष
नवरात्रि का पर्व हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान रखता है। यह त्यौहार केवल धार्मिक उत्सव नही है, बल्कि यह हमारे जीवन में शक्ति, संयम, और भक्ति का प्रतीक है। Navratri में नवदुर्गा की पूजा करने से सभी भक्तों को मानसिक, शारीरिक, और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। परिवार में सुख और समृद्धि का विस्तार होता है।
नौं देवियों में से हर एक देवी अपने कुछ अलग विशेष गुण और महत्व के लिए प्रसिद्ध है। सभी देवियों की पूजा से भक्तों को विभिन्न प्रकार की सिद्धियां और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। Navaratri के ये नौ दिन आत्मशुद्धि, ध्यान, और भक्ति के लिए सबसे उत्तम होते हैं। इस दौरान की जाने वाली पूजा और व्रत से मनुष्य को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और शांति प्राप्त होती है।
आइए हम सभी भक्त इस नवरात्रि पर, आदिशक्ति भगवती दुर्गा माता की पूजा आराधना करके अपने जीवन में शांति, समृद्धि, और सफलता के लिए माता का आशीर्वाद प्राप्त करें। जय माता दी।
⚠️ डिस्क्लेमर (Disclaimer)
“यह लेख केवल सामान्य जानकारी प्रदान करता है; किसी भी निर्णय से पहले स्वयं के विवेक से काम लें।”
मनोज आचार्य जी एक ज्योतिषी और कन्टेंट राइटर हैं। इन्होंने Master of Art in Jyotish Shastra and Master of Art in Mass communication की डिग्री प्राप्त की है और दोनों क्षेत्रों में व्यापक ज्ञान और अनुभव रखते हैं। आचार्य जी ज्योतिष शास्त्र के क्षेत्र में लगभग 10 वर्षों का अनुभव रखते हैं। हजारों कुंडलियों के विश्लेषणात्मक अध्ययन और अपने समर्पण और कड़ी मेहनत के द्वारा गहन विशेषज्ञता हासिल की है। इसके अलावा आचार्य जी अन्य विषयों जैसे कि पत्रकारिता, ट्रेवल, आयुर्वेद, अध्यात्म, सामाजिक मुद्दों, हेल्थ आदि पर भी अपने विचार लेखों के माध्यम से साझा करते रहते हैं।