क्या आप निसंतान हैं? क्या शादी के कई साल बाद भी आपको संतान नही हो रही है? अगर ऐसा है तो आप अपनी कुंडली से जान सकते हैं कि कब संतान सुख की प्राप्ति होगी? Is Santan Yog in Kundli available or not? इस लेख के माध्यम से आज आप स्वयं कुंडली के माध्यम से संतान योग के बारे में पता लगा सकेंगे। संतान प्राप्ति के ज्योतिषीय उपाय भी जान सकेंगे। चलिए आपको बताते हैं संतान सुख प्राप्ति के विषय में कुंडली आपको क्या संकेत देती है।
जन्म कुंडली ज्योतिष शास्त्र का एक सबसे महत्वपूर्ण साधन है जिसके माध्यम से व्यक्ति के जीवन से संबंधित सभी पहलुओं का विश्लेषण बड़ी सटीकता से किया जा सकता है। उन्हीं कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक पहलू है संतान योग अर्थात संतान प्राप्ति का समय और उससे जुड़ी हुई संभावनाएं।
प्रत्येक व्यक्ति की जिंदगी में औलाद सुख का बहुत अधिक महत्व होता है और ज्योतिष शास्त्र में कुंडली के माध्यम से यह जानना संभव है कि संतान प्राप्ति कब होगी और उसका भविष्य कैसा होगा, उसके जीवन में किस प्रकार के बदलाव आएंगे। इस लेख में हम इसी विषय ‘Santan Yog in Kundli’ पर विभिन्न ज्योतिषीय ग्रंथों, किताबों और तथ्यों के आधार पर विस्तार से विचार किया गया है।
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संतान के विषय में बताने वाले कुंडली के भाव
भारतीय ज्योतिष शास्त्र अनुसार संतान योग इन कुण्डली के विषय में गहरी जानकारी के लिए सबसे प्रमुख भाव पंचम भाव कहा गया है। इसके अलावा नौवें भाव और ग्यारहवें भाव को भी संतान सुख के विषय में विचारणीय माना गया है। इन तीनों भावों के गहन अध्ययन से संतान से संबंधित संभावना का पता लगाया जा सकता है। चलिए एक-एक करके इन तीनों भावों को समझने की कोशिश करते हैं। 
1. पंचम भाव (घर): कुंडली के इस भाव को सुत भाव के नाम से भी जाना जाता है। इस भाव के स्वामी को पंचमेश और सुतेश कहा जाता है। कुंडली के इस घर से संतान योग, संतान की खुशी, उनकी रचनात्मकता और प्रेम संबंधों के बारे में विशेष जानकारी प्राप्त होती है।सुत भाव का स्वामी (पंचमेश) और इस भाव में मौजूद ग्रह संतान योग (प्राप्ति) के समय और संभावनाओं को बहुत प्रभावित करते हैं। संतान से संबंधित ज्ञान के लिए इस भाव में उपस्थित ग्रहों, इस भाव पर ग्रहों की दृष्टि, ग्रहों की युति आदि का गहन अध्ययन किया जाता है। जिसके विषय में आगे विस्तार से बताया गया है।
2. नवम् भाव: इस भाव को धर्म भाव भी कहते हैं। यह भाव जातक के भाग्य और धर्म विषय में जानकारी प्रदान करता है। इस भाव में उपस्थित ग्रहों का फल ग्रहों के प्रकार, दृष्टि, युति आदि पर निर्भर करता है। नवम भाव और उसमें मौजूद ग्रहों की स्थिति जातक के संतान सुख को बहुत हद तक प्रभावित कर सकती है।
3. ग्यारहवां भाव: कुंडली का यह स्थान आय और जीवन यापन के लिए किये जाने वाले कार्य का भाव कहलाता है। इस भाव से जातक की आर्थिक स्थिति, इच्छाओं, आकांक्षाओं की जानकारी खोली जाती है। संतान सुख से भी इसको जोड़कर देखा जाता है। इस भाव की संतान की खुशी के बारे में पता लगाने में अहम भूमिका होती है।
संतान के विषय में भाव विश्लेषण के मुख्य घटक
संतान के विषय में विचार करने के लिए पंचम भाव का विश्लेषण सबसे ज्यादा मायने रखता है। इसके अलावा नवम् और एकादश भाव भी बहुत मायने रखते हैं। इन भावों का विश्लेषण करते समय नीचे बताए गए प्रमुख ज्योतिषीय विश्लेषण के घटकों पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है-
- भावेश- भाव का स्वामी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, देखें कि यह किस ग्रह के साथ स्थित है और युति में है और कौन-कौन से ग्रहों की दृष्टि में है। जातक पर कौन सी दशा एवं अन्तर्दशा है।
- भाव में ग्रहों की स्थिति- भाव में कौन-कौन से ग्रह स्थित हैं और वो किस प्रकार के ग्रह हैं, उच्च के हैं या नीच के हैं, या पापी है या क्रूर ग्रह हैं। कौन सी गति से चल रहे हैं। कैसा फल दे रहे हैं।
- ग्रहों की दृष्टि- भावों पर ग्रहों की दृष्टि बहुत मायने रखती हैं कि कौन-कौन से ग्रह भाव को अपने स्थान से देख रहे हैं? शुभ ग्रहों की दृष्टि से हमेशा शुभ परिणाम में वृद्धि होती है, और अशुभ ग्रहों की दृष्टि अशुभ परिणाम देते हैं।
- युति- दो या दो से अधिक जब एक ही भाव में बैठे हों तो सभी ग्रहों के विषय में गहनता से विचार करना चाहिए जैसे ग्रहों की गति, नीच या उच्च, मित्र या शत्रु इत्यादि।
- गोचर- ज्योतिष अनुसार गोचर का प्रभाव संतान प्राप्ति से पहले कम, परन्तु संतान प्राप्ति के समय बहुत पड़ता है। पंचम भाव में ग्रहों का गोचर ज्यादा प्रभाव डालता है। इस भाव में जब चंद्रमा, बृहस्पति और शुक्र का गोचर, नौवें और ग्यारहवें भाव से संबंधित हो तो उस समय संतान प्राप्ति की संभावना बहुत बढ़ जाती हैं।
पंचमेश का भावनानुसार विश्लेषण
पांचवें भाव के स्वामी को पंचमेश कहते हैं। वह जिस भाव में कुंडली में उपस्थित होता है उसी के अनुसार फल प्रदान करता है। चलिए देखते हैं कि संतान योग इन कुण्डली के अनुसार यह कौन से भाव में किस प्रकार का फल देता है:
- लग्न भाव में पंचमेश अगर है तो जातक ऐसे पुत्र का पिता बनता है जो ख्याति प्राप्त संगीतज्ञ, विचारक, विद्वान और चतुर होता है। लग्न का पंचमेश दो संतान का संकेत भी देता है। एक पुत्र का शोक हो सकता है।
- द्वितीय भाव में अगर पंचमेश हो तो निर्धनता लिए और कष्ट कारक संतान होती है, परन्तु पंचम भाव में उपस्थित ग्रह इस संभावना को समाप्त कर सकते हैं।
- पंचमेश अगर तृतीय भाव में है तो पुत्र मधुरभाषी होता है, अच्छी नीति का ज्ञाता होता है, दूसरों को आश्रय देता है। परिवार का मान सम्मान बढ़ाने वाला होता है।
- चतुर्थ भाव में पंचमेश की कृपा से जो संतान होती है, वह माता-पिता की सेवा करने वाली, गुरुजनों का आदर करने वाली और सुंदर, गुणवान, परिवार को जोड़कर रखने वाली होती है। चौथे भाव में पंचमेश व्यक्ति को कम उम्र में ही पौत्र-पौत्री वाला बनाता है।
- पंचम भाव में ही अगर पंचमेश हो तो संतान चरित्रवान होती है। पिता की प्रिय होती है, विद्वान होती है, समाज में ख्याति प्राप्त करती है। पंचमेश के साथ अगर बृहस्पति हो तो यह भी व्यक्ति को छोटी उम्र में ही पौत्र-पौत्रियों से खेलने की संभावना प्रकट करता है।
- पंचमेश अगर छठे भाव में उपस्थित है तो संतान की संभावनाएं कम हो जाती हैं। अगर संतान होती भी है तो वह बीमार, दुख और पीड़ा देने वाली होती है। परंतु पंचम भाव में उपस्थित ग्रह संभावना को प्रभावित कर सकते हैं।
- सप्तम भाव का सुतेश सुंदर कन्या के रूप में संतान प्राप्ति का संकेत देता है। संतान माता-पिता को सुख देने वाली होती है। पंचमेश अगर शुभ ग्रहों के साथ है तो संतान धार्मिक प्रवृत्ति वाली वाद विवाद में निपुण और व्यवसाय करने वाली आज्ञाकारी सब की प्रिया होती है।
- अष्टम भाव का सुदेश कष्टकारी संतान की ओर संकेत करता है। अष्टम भाव के पंचमेश पर अगर शुभ ग्रहों की दृष्टि और कृपा होती है तो दो पुत्रों का सुख भोगने का फल मिलता है ऐसी परिस्थितियों में 24 वर्ष में संतान थोड़े कष्टों से होती है। इसके अलावा₹25 वर्ष में और 36 से 40 साल की उम्र में संतान होने की संभावना बनती है।
- नवम भाव का पंचमेश विद्वान, संगीत प्रिय, सुंदर सुबोध और ख्याति प्राप्त करने वाली संतान की ओर संकेत करता है। नमेश और पंचमेश अगर दोनों एक साथ नवंबर भाव में स्थित हैं तो संतान शिक्षक उपदेश या राजा की तरह जीवन जीती है।
- दसवें भाव का पंचमेश मातृप्रिय संतान की प्राप्ति का संकेत करता है। ऐसी संतान का झुकाव पिता से ज्यादा माता की तरफ रहता है। पंचमेश और दशमेश दोनों एक दूसरे के भावों में हो या फिर त्रिकोण से दृष्टिगत हो तो जातक का भाग्य राजा की तरह होता है।
- एकादश भाव का पंचमेश जातक को पुत्रवान बनाता है। संतान धनवान और भाग्यशाली होती है। अगर पंचम भाव के साथ शुभ ग्रहों का योग बनता हो तो संतान बहुत अधिक प्रभावी होती है।
- द्वादश भाव का पंचमेश पुत्र प्राप्ति की ओर संकेत करता है परंतु अगर साथ में क्रूर ग्रह हैं तो निसंतान होने का संभावना बढ़ जाती है। शुभ ग्रहों की दृष्टि होने की स्थिति में 41 से 45 वर्ष की आयु के बीच दो पुत्र होने की संभावना प्रबल होती है। पिता पुत्र के लिए बाधाएं उत्पन्न करने वाला, हानि करने वाला होता है।
जानें Santan Yog in Kundli के बारे में सभी ग्रह क्या बताते हैं
संतान के विषय में कुछ प्रमुख ग्रहों से शुभ और अशुभ खुलासे होते हैं। शुभ ग्रह शुभ फल प्रदान करते हैं और अशुभ और पाप ग्रह अशुभ फल देते हैं। चलिए इन ग्रहों के बारे में विस्तार से जानते हैं।
पंचम भाव में ग्रहों का संतान संबंधित शुभाशुभ फल
1. बृहस्पति- ज्योतिष शास्त्र में गुरु को संतान का सबसे मुख्य कारक ग्रह माना गया है। पंचम भाव में अगर बृहस्पति ग्रह उपस्थित हैं या पंचमेश है, या दृष्टि है, तो सबसे उत्तम संतान योग बनता है। ऐसी स्थिति में विवाह के तुरंत बाद संतान सुख प्राप्त होता है। परन्तु यहां देखना होगा कि किसी पाप ग्रह कि युति या दृष्टि तो नही है। जितना उच्च का गुरु उतना शुभ मानना चाहिए। संतान सुख के अलावा बृहस्पति शिक्षा और ज्ञान का प्रतिनिधित्व भी करता है।
2.शुक्र ग्रह- यह सौंदर्य, प्रेम और संतुलन का कारक ग्रह माना गया है। कुंडली में इसकी शुभ स्थिति से संतान सुख प्राप्ति में वृद्धि होती है। शुक्र की स्थिति हमेशा व्यक्ति के संतान सुख और उससे जुड़ी हुई खुशियों को बहुत प्रभावित करती है। अगर पंचम भाव में शुभ शुक्र ग्रह उच्च का हो या उसकी शुभ दृष्टि हो तो प्रबल संतान योग बनता है। शुक्र की अन्य ग्रहों से युति अति शुभ फलदाई होती है।
3. चंद्रमा- यह जातक के मन, भावनाओं और मातृत्व का कारक ग्रह है। कुंडली में और खासकर पंचम भाव में इसकी मजबूत स्थिति और प्रभाव जल्दी बच्चे पैदा होने का संकेत देती है। इसके साथ पंचम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो यह ओर भी शुभ माना जाता है। होने वाली संतान पर हमेशा चंद्रमा का शुभ प्रभाव रहता है। संतान शांत और सुन्दर होती है। अगर पंचम का चंद्रमा क्षिण हो और पाप ग्रहों के प्रभाव क्षेत्र में आता है, तो अधेड़ उम्र के बाद पुत्र संतान सुख प्राप्त होता है।
4. सूर्य- यह एक क्रूर ग्रह है जो स्वाभाविक है कि क्रूर फल देगा। अगर पंचम भाव में सूर्य स्थिर राशि में है और प्रबल है तो पहली संतान का बचना मुश्किल होता है। अगर चर राशि में हो तो भी संतान सुख प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होती है। अगर सूर्य पंचमेश हो और शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो तेजस्वी पुत्र प्राप्त होता है। अगर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो कन्या का आगमन होता है। सूर्य के साथ शुभ ग्रहों की युति या दृष्टि हो तो पुत्र सुख की संभावना सबसे ज्यादा होती है।
5. मंगल- पंचम भाव में अगर मंगल प्रबल है तो पत्नी के प्रथम गर्भ को हानि होती है, गर्भपात की संभावना भी बनती है। ऐसी अवस्था में होने वाली संतान कमजोर और रोगी पैदा होती है। मंगल के साथ गुरु की युति अति हानिकारक होती है। अगर पंचम का मंगल शुभ ग्रहों से प्रभावित हो या दृष्टि में हो तो एक अच्छे रूपवान पुत्र का जन्म होता है। पंचम भाव का मंगल संतान के रूप में दत्तक पुत्र का संकेत भी देता है।
6. बुध- पंचम भाव में बुध की मौजूदगी सही फल नहीं देती है ऐसे जातक को पुत्र सुख 25 साल की उम्र में मिलता है परंतु एक वर्ष तक संतान माता और मामा के लिए भारी रहती है। पंचम भाव का मंगल अगर अस्त हो या उसे पर शुक्र की दृष्टि हो तो संभावना रहती है कि पुत्र शोक हो। बुध के साथ शनि कि युति एक ही संतान का संकेत देती है। बुध और राहु की युति भी संतान के लिए शुभ नहीं होती है। अगर बुद्ध शुभ ग्रहों से युक्त और दृष्टि वाला हो तो सुंदर, बुद्धिमान और कला के प्रति रुचि रखने वाली संतान जन्म लेती है।
7. शनि- शनि ग्रह कुंडली के पंचम भाव में स्थित हो तो संतान चंचल, चप्पल, उदासीन, घुमने की शौकीन और बुद्धिमान होती है। इस पर अगर अन्य पाप ग्रह और क्रूर ग्रहों की दृष्टि या युति का प्रभाव पड़ रहा हो तो संतान प्राप्ति में देरी होती है। गुरु की दृष्टि दो शादियों का संकेत देती है और दूसरी पत्नी से संतान की संभावना बढ़ती है। पंचम में नीच राशि का शनि पुत्र के लिए हानिकारक होता है। शनि ग्रह की उपस्थिति में पंचम पर एक से अधिक ग्रहों की दृष्टि पिता या पुत्र के दत्तक पुत्र होने का संकेत देती है।
8. राहु और केतु- दोनों छाया ग्रह कभी भी अकेले कोई प्रभाव प्रकट नहीं करते अर्थात यह अकेले किसी भी प्रकार का फल नहीं देते हैं। यह जिस ग्रह के साथ कुंडली के जिस भाव में युक्त होते हैं उसी के अनुसार फल देते हैं जैसे अगर पंचम भाव में पाप ग्रह के साथ है तो पाप ग्रह के प्रभाव को बढ़ा देते हैं। उसी प्रकार अगर शुभ ग्रह के साथ है तो शुभ ग्रह के फल को भी बढ़ा देते हैं। अगर पंचम भाव में राहु चंद्रमा के साथ हो तो पुत्र हानि होती है, परंतु कर्क राशि में हो तो पुत्र सुख भी मिलता है। सिंह राशि के साथ कभी-कभी अच्छा संतान सुख का फल भी देते हैं।
मुख्य संतान योग इन कुण्डली एवं उनके प्रभाव
- संतान सुख योग- कुंडली के पंचम भाव में जब बृहस्पति, शुक्र या चंद्रमा शुभ स्थिति में बैठे हों और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो प्रबल संतान सुख योग बनता है। पंचमेश अगर स्वराशि या उच्च राशि में स्थित हो तो संतान सुख योग बनता है। इस प्रकार के योग उत्तम प्रकार की संतान प्राप्ति का संकेत देते हैं।
- पुत्र योग- जब पंचम भाव का स्वामी अर्थात पंचमेश शुभ ग्रहों के साथ हो और अनेक शुभ ग्रह पंचम भाव में स्थित हों तो पुत्र योग बनता है। पंचमेश की दशा चल रही हो तो पुत्र योग बनता है। संतान प्राप्ति के समय बृहस्पति की दशा चल रही हो तो पुत्र रत्न प्राप्त होता है। इस प्रकार का योग संतान प्राप्ति में अहम भूमिका निभाता है।
- धन योग- कुंडली में बनने वाले धन योग का प्रभाव संतान सुख पर भी पड़ता है। जब पंचम भाव का स्वामी किसी शुभ ग्रह के साथ संबंध रखता है तो धन योग बनता है, जो संतान सुख में वृद्धि करता है। जैसे पहले, दुसरे, पांचवें, नौवें घर के स्वामी किसी भाव में युति करें तो धन योग बनता है।
संतान प्राप्ति के लिए ज्योतिषीय उपचार
शुद्धि, शांति और सच्चे मन से संतान सुख की प्राप्ति में किये जाने वाले ज्योतिषीय उपाय उपयोगी होते हैं। निम्नलिखित ज्योतिषीय उपाय संतान सुख प्राप्ति में आपके लिए सहायक हो सकते हैं:
- बृहस्पति ग्रह की पूजा-अर्चना: बृहस्पति को प्रबल करने के लिए उसकी पूजा लाभ देती है। बृहस्पति के मंत्रों का जाप करने से संतान सुख प्राप्त होता है। पूजा और जाप के लिए इस मंत्र मंत्र का प्रयोग करें- ।।ॐ ह्रीं क्लीं हूँ बृहस्पतये नमः।।
- शुक्र की पूजा-अर्चना: शुक्र की पूजा और उसके मंत्रों का जाप करने से संतान सुख में वृद्धि होती है, पति-पत्नी में प्रेम बढ़ता है। परिवार में शांति आती है। शुक्र मंत्र का जाप करें। ।ॐ ह्रीं श्रीं शुक्राय नमः।
- चंद्रमा की पूजा: चंद्रमा मन का कारक है इसकी पूजा और मंत्रों का जाप करने से संतान सुख में वृद्धि होती है। चन्द्रमा के प्रभाव को बढ़ाने के लिए चन्द्र मंत्र का पाठ करें। ।। ॐ ऐं क्लीं सोमाय नमः।।
- विशेष व्रत और अनुष्ठान: संतान प्राप्ति के लिए विशेष व्रत और अनुष्ठान भी किए जा सकते हैं, जैसे संतोषी माता व्रत, संतान गोपाल मंत्र का जाप संतान गोपाल मंत्र- ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते । देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं जनार्दनम् । अङ्के शयानं देवक्याः सूतिकामन्दिरे शुभे ।। एवं रूपं सदा कृष्ण सुतार्थं भावयेत् सुधीः ।।शङ्खचक्रगदापद्मं दधानं सूतिकागृहे । अङ्के शयानं देवक्याः कृष्णं वन्दे विमुक्तये ।। ॥ ॐ देवकी सूत गोविंद वासुदेव जगतपते देहिमे तनय कृष्ण त्वाहम शरणगते ॥
निष्कर्ष
ज्योतिष शास्त्र में कुंडली विश्लेषण के माध्यम से संतान सुख प्राप्ति के समय का पता लगाना संभव है, अगर कुंडली का विश्लेषण ध्यान से बिना किसी त्रुटि के किया जाए तो। संतान के विषय को समझने के लिए कुंडली में पंचम्, नवम् और एकादश भाव का विश्लेषण सबसे ज्यादा मायने रखता है। ग्रहों में गुरु, शुक्र और चंद्र की स्थिति सबसे ज्यादा मायने रखती है। ग्रहों के साथ-साथ दशा, महादशा, अंतर्दशा का भी संतान सुख प्राप्ति में महत्व होता है।
गर्भावस्था के दौरान गोचर का प्रभाव जाना बहुत जरूरी है और जन्म कुंडली के साथ उसका संयोग भी समझना चाहिए। कुंडली में बनने वाले विभिन्न योग भी संतान प्राप्ति के समय और संभावनाओं का सटीक संकेत देते हैं। अगर संतान सुख नही मिल पा रहा है तो ज्योतिषीय और अध्यात्मिक उपाय बहुत सहायक होते हैं। अगर आपको कुछ जानना है तो आप हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। आपको संतान योग इन कुण्डली के विषय में जानकारी देने वाला यह लेख कैसा लगा। अपने विचार जरूर साझा करें।
स्रोत: जातक अलंकार, उद्भुत ज्योतिर्विज्ञान में द्वादशभाव, jyotish Tatvank
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